शनिवार, 3 मई 2014
नकारात्मक मोहब्बत यानि “नमो”
सोमवार, 30 दिसंबर 2013
सम्बन्धों कि अनुकूलता आवश्यक है राजनीती के लिए।
अपने सम्बन्धों कि अनुकूलता पर विशेष ध्यान देने कि जरूरत है क्योंकि , राजनीती अकेले की जाने वाली कोई व्यवसाय या खेल नहीं अपितु सम्मिलित रूप से राज काज कि सुदृढ़ व्यस्था एवं जन कल्याण को स्थापित करने की विधा है।
हम अनावश्यक रूप से खुद को महत्व देने में इतने मसगूल हो जाते हैं कि हर बात को अपने नफा नुक्सान से तोलने लगते हैं और इस बात से कोसों दूर चले जाते हैं कि हम किस वजह से साथ चल रहे हैं और किस वजह से साथ चलते रहेंगे। खुद को मनगढंत सेनापति , राजनायक , नेता या समाजसेवी समझ लेना और बात है और खुद को उपरोक्त विशेषणों पर खरा साबित करना और बात है।
कटू परन्तु सत्य यही है कि जो लोग राजनीती को व्यवसाय मान के राजनीती में निश्चित लाभ के हेतु प्रवेश करते हैं , वस्तुतः राजनीती उनके लिए नहीं है ये बात अब धीरे धीरे सामने आ जायेगी। जनतंत्र कि स्थापना के कई मूलभूत सिद्धांतों में से एक है जनकल्याण एवं बहुगणवाद। अल्पकालिक राजनीती वर्गवाद और क्षेत्रवाद से प्रभावित अथवा संचालित एवं फलित दिख सकती है परन्तु दीर्घकालिक राजनीती हमेशा के लिए उदारवाद और जनकल्याण से ही प्रेरित रहेगी। हमें ध्यान ये देना है कि हम मूलभूत सिद्धांतों से न भटकें। सफलताओं को देख कर नए मानदंडों कि पुनर्रचना में उन्मुख होने कि बजाय खुद के अस्तित्व को समझ कर खुद के द्वारा जनसामान्य को सर्वोत्तम सेवा देने के प्रयोग में लग जाएं , सम्भवतः यह एक चिरंजीवी राजनीती कि नीव होगी और नेता सर्व विजयी एवं सार्वभौमिक होगा।
हम जैसा सोंचते हैं वैसा ही बन जाते हैं। मैने कई लोगों को "आप " की सफलता के बाद कहते सुना - "हम भी अगर आप पार्टी ज्वाइन कर लेते तो आज विधायक तो जरूर बन गए होते " , मुझे अफ़सोस इस बात से हो रहा है कि अभी तक ऐसे नवसिखिओं को राजनीती कि "र" भी समझ नहीं आयी। कुछ लोग तो अरविन्द केजरीवाल से दोस्ती गाढ़ने में लग गए हैं तो कुछ लोग केजरीवाल को अपने प्रोफाइल से प्रभावित कर उसके साथ सम्मिलित होने के रास्ते ढूंढने में लग गए हैं। कुछ लोग केजरीवाल कि सफलता से इतने उत्साहित हो गए हैं कि वो किसी कीमत पर आगामी लोक सभा चुनावों में उसकी पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए खुद को प्रस्तुत करने अथवा करवाने के कई उपायों को लगाने में लग गए हैं।
मूल मंत्र एक ही है , जनता का विश्वास।
केजरीवाल को जनता का विश्वास मिला क्योंकि उसने इस विश्वास को हासिल करने के लिए खुद को उनके बीच रखा। हर क्षेत्र कि समस्या अलग थी लिहाज़ा अलग अलग अजेंडे पर अलग अलग इलाकों में चुनाव लड़े गए। राजनीती ये नहीं होती कि आप सत्ता में आ जाओ। राजनीती ये होती है कि आप जनता कि भावनाओं से खुद के एजेंडों को जोड़ दो। और ये तब होगा जब आपका एजेंडा जनता का एजेंडा होगा। वही हुआ और केजरीवाल को समर्थन और विश्वास दोनों मिला। अब केजरीवाल को ब्रांड इमेज बना कर मीडिया और अन्य नवसिखिये नेतागण खुद का कल्याण करने में लग जाएँ तो इसमें न तो जनता का दोष होगा न केजरीवाल का लेकिन सत्यानाश सिर्फ एक चीज का होगा वो है जनता का प्रकट विश्वास जो उसने व्यवस्था परिवर्तन के लिए दिखलाया है।
जनता दल (यू ) ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में अपनी महत्वकांक्षा में मुह कि खाई है। पता नहीं कितने लोग इस चोट को खाने के लिए खुद को जिम्मेदार मानते होंगे। भाजपा एवं अन्य दलों कि भी यही कहानी होगी। कांग्रेस के लिए तो सदमा काफी गहरा रहेगा लेकिन जो बात स्वस्थ राजनीती कि ओरे इशारा कर गयी वह ये कि खुद को बड़ा समझने वाला हमेशा से खुद के लिए विखंडन अथवा नाश को ही न्योता देता है। जो लोग खुद को जनता से अलग यानि विशेष समझने में लगे थे इतिहास गवाह है उनका क्या हश्र हुआ है।
खैर अब बात ये आती है कि हम सुधार कि शुरुआत कहाँ से करें ? सबसे पहले हम सबको विनम्रता धारण करने कि आवश्यकता है। अपने सम्बन्धों पर ध्यान देने कि आवश्यकता है और सहनशीलता बरतने कि आवश्यकता है।
गौर से देखेंगे तो जदयू भाजपा के सम्बन्धों कि कटुता एवं अंततः सम्बन्ध विच्छेद ने एक दूसरे को काफी नुक्सान पहुँचाया है जो आने वाले दिनों में और भी मुखर होकर दिखेगा। कांग्रेस सहित अन्य दलों में भी आपस के सम्बन्धो के बीच खाई बढ़ने कि वजह से उन्हें भी काफी नुक्सान देखने में आये हैं। और कई लोग तो व्यक्तिगत कारणो से खुद को दयनीय स्थिति में "मनगढंत मालिक" बना के रखने को विवश हैं, भले ही उन्हें कुछ आता जाता हो अथवा नहीं ये और बात है।
जो व्यक्ति अथवा दल अपने हितैषिओं कि क़द्र नहीं करता उसका क्या सुनिश्चित होता है ? कौन कह सकता है ? आप खुद समझदार हैं ;
…… क्रमशः
सोमवार, 18 जून 2012
J.D.(U) Showing Matured Politics in Presidential Elections 2012
Dr A.P.J Abdul Kalam is an Iconic person, He is an Ideal for the generations, I believe he is beyond the reach of the Politics.. and His name must not be used for such a Politics shown by B.J.P. to hold sweets in both the hands..
B.J.P. seems to be very occupied with the internal conflicts, perhaps it is the reason that, they couldnt make their mind for the candidate, and if they make their mind they couldnt get the common understanding over it through NDA. Otherwise it had much time to think and rethink on the Issue, these are the instances that seems they are happening suddenly but they took birth in far past.
I appreciate our Party's i.e. Janata Dal United Political Stand but I am worried as a whole as we are the part of NDA, and since BJP claims to be the biggest party as NDA alliance, they had to rearrange their mind and make common consensus on Presidential Candidate in previous times...
In my view, "Any Political Party should avoid Instantaneous Politics. They Must focus themselves with persisting Politics."
Sharad ji, No doubt, has a great instinct of Politics and perhaps this is the reason, NDA should take their steps towards making their mind to form and place enough grounds to support existing candidate or extend their support or announce a new Candidate on behalf of NDA..
In my personal View "Mr. Pranab Mukherjee is also the good choice", Lets see what our elders Think..
Good Luck to the Candidates..
I believe Honesty is the best policy.
मंगलवार, 6 जुलाई 2010
बेअसर..भारत बंद..! असरदार?

शनिवार, 17 अप्रैल 2010
चौथा खम्भा : मरम्मत की जरूरत

मंगलवार, 10 नवंबर 2009
जनता जन्तु - निरंकुश राज
बंगलूरू १० नवम्बर ।मैं इन्तेजार कर रहा था की राज ठाकरे के मुद्दे को लेकर क्या सोंच रखते हैं हमारे राज नेता... हमने देखा की सारे नेता गन जनता को जन्तु समझने से बाज नही आ रहे। राज ठाकरे तो अपनी पहचान के लिए लालायीत है और वो सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए भोंडे भाषण कला और घिनौनी और गन्दी राजनीति या आप यूँ कहें की ठाकरेनिति को लागू करने में लगा है... कहाँ गए हैं इस देश की मान सम्मान की रक्षा का दंभ भरने वाले हमारे राज नेता ? लोकतंत्र शर्मशार हो गया... ये कह देने मात्र से राज सरीखे देश्द्रोहिओं को कोई फर्क पड़ जाएगा.... ऐसा नही लगता... जो दल इस देश के संविधान में आस्था नही रखता उस दल के चार सिपहिओं को ही क्यों पूरे दल को विधानसभा या लोकसभा से निष्काषित क्यों न कर दिया जाए ? दल के मुखिया को देशद्रोह के मामले में लेकर क्यों न कारागार में ठूंस दिया जाए? किस बात का इन्तेजार है भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार को ? इश्वर की शपथ लेकर जनता के हितों की रक्षा और भारत के अखंडता और सम्प्रबूता की रक्षा का प्रण लेने वालों को ? अगर इनलोगों नें चूडियाँ पहन कर राज ठाकरे के दरबार में नर्तक और नार्ताकिओं की भांति नाचने गाने के लिए ही प्रतिबद्धता स्वीकार कर ली है... और कोई भी मजबूरी अगर इन्हे देश्द्रोहिओं को वाजीब सज़ा देने से रोक रही है तो ... बेहतर ये है की जनता का मुख देख कर... उनके भावनाओ का ख्याल करते हुए संवैधानिक भाषा में जवाब देने के बजाये... मजबूत कदम उठायें ताकि देश्द्रोहिओं को पनाह के लिए तरसना पड़ जाए.... आज नही तो कल इस देश की जनता सबक सिखाएगी उस हर राष्ट्र सेवकों को जो राजनैतिक मज्बूरिओं का हवाला देकर जनता को जन्तु समझने की गलती कर बैठते हैं...
राज ठाकरे.... को संहारने के लिए शरद यादव, नीतिश कुमार, मुलायम सिंह, लालू यादव, राम विलास पासवान और ऐसे ही कई राजनैतिक हस्तियों की जरूरत नही... बल्कि इस देश के एक सच्चे नौजवान देशभक्त की जरूरत है.... जो राजनीति से ऊपर उठ कर देशभक्ति की बात सोंच सके...
ठाकरे निति कहती है की मराठा मानुष के नाम पर देश को ताख पर रख दो.... और राष्ट्र के संविधान को चूल्हे में लगा दो... और इस ठाकरे निति से हमारे देश के स्वाभिमान अखंडता एकता और संप्रभुता को खतरा हो तो भी हाथ पर हाथ रख कर बैठना कोई राजनैतिक मजबूरी हो सकती होगी किसी सरकार , दल अथवा किसी राजनेता की... लेकिन जिस जनता को जन्तु मान के लोग बैठे हैं... इस जनता में जरा जागृति का संचार हनी भर की देर है.... क्रिकेट प्रेम में देशभक्ति प्रर्दशित करने वाली जनता को अब ये भी समझ में आना चाहिए की देश प्रेम केवल क्रिकेट ... नाच गानों के प्रतियोगिओं के नाम पर संक्षिप्त संदेश भेज कर या पाकिस्तान विरोधी नारे लगा देने भर से कोई रस्व्ह्त्र भक्त नही हो जाता.... राष्ट्र की गरिमा को धूमिल करने वालों को ख़तम करना भी राष्ट्र भक्ति है... अलगाव्वादिओं को अगर सरकार नही रोक सकती तो फिर उनका फैसला जनता करेगी.... और जनता के द्वारा चुनी गई सरकार अपनी मज्बूरिओं को गिनाती रहेगी.... लेकिन मुझे लगता है... की जन्तु बन चुकी जनता ही काफ़ी है इस राज के खात्मे के लिए... लोग तमाशा देखते रह जायेंगे और "गणपति" अपना फ़ैसला कर देंगे....
शर्म करने की जरूरत राज ठाकरे को नही... क्योंकि ये तो राष्ट्र द्रोही है ही.... इनकी शब्दकोष में स्वभक्ति है... स्वकल्याण एवं राजनैतिक दूर्भिक्ष्ता से पलायन कर राजनैतिक बहार को पाने की उत्कट लालसा है... वो भी जैसे तैसे... चाहे राष्ट्र की कीमत पर हो या राष्ट्र भाषा की कीमत पर...
बल्कि शर्म तो भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा की कसम खा कर राजनैतिक श्रेष्ठ पदों पर आसीन हुए लोग और विधि के नाम पर स्थापित भारत के संविधान में अटूट आस्था के नाम पर बनाये गए दलों और परशन के प्रमुखों और राज्य व राष्ट्र सेवा में संलग्न अधिकारिओं और पुलिश बल और इन्सबसे ऊपर न्यायपालिका को होनी चाहिए.... ये तमाशा देख कर संवैधानिक भाषा में टिपण्णी करके जनता को अपना मत और सोंच प्रर्दशित करने का समय नही ... अपितु देश्द्रोहिओं की शल्य चिकित्सा के मानदंड स्थापित करने का वक्त है...
कोई नही करेगा तो "गणपति" कर देंगे... जो जनता के सच्चे प्रतिनिधि हैं आधा जन्तु - आधी जनता।
देखना है की ठाकरे महाराष्ट्र से गणपति को कैसे निकल बहार करते हैं... या ये गणपति ठाकरे को राजनीती से निकल बहार करते हैं....
जो व्यक्ति... दल अथवा संगठन देशद्रोह को समर्थन दे रहा हो... उसको अगर आधिकारिक रूप से मुद्रा के व्यवहार पर रोक लगा दिया जाए तो फिर देखते हैं.... मराठा मानुष के नाम पर देश द्रोह चलाने वालों में कितनी सलाहियत है.... ये केवल मराठा मानुष के नाम पर देश्द्रोहिओं पर ही नही बल्कि उस हर संगठन से ताल्लुक रखने वाली चीज है जो इस देश में अलगाववाद को बढावा देते हैं....
"सत्यम तवैव विज्ञातु "
इस मंत्र के आधार पर अगर खोज की जायेगी तो पता लगेगा की मराठा प्रेम राज ठाकरे की निजी सोंच है... जबकि देश प्रेम मराठों की आम सोंच है... अतः दोषी मराठी नही... ठाकरे हैं...
अनर्गल प्रलाप का वक्त नही... निरंकुशता व राष्त्रद्रोहिओं को काबू करने की कवायद की आवश्यकता है... अपराधी समूह नही व्यक्ति होता है ... अपराधिओं का संगठन हो सकता है ... राज्य या देश नही ।
जय हिंद जय जनते ॥
आर.के.जुगनू
सोमवार, 3 अगस्त 2009
लाल क्रन्तिकारी या तो पीठ हैं या फ़िर पेट

शनिवार, 1 अगस्त 2009
आजाद गुलामी : गुलाम भारत
दरअसल अंग्रेजों की गुलामी नें इस हिंदुस्तान में नौकरी को इस कदर थोप दिया की आज भी इंसान नौकर ही पैदा हो रहा है। कोई लाख पढ़ लिख ले उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ नौकरी करना होता है। जो नौकरी नही करते उनकी कोई पूछ नही । जो नौकर हैं उनकी हर जगह पूछ है। जो आजाद ख्याल हैं किसी की गुलामी पसंद नही करते वो हो सकता है भारत के स्वाभिमान को एक बार फिर से जिन्दा कर दें लेकिन जो नौकरी पसंद हैं वो तो सिर्फ़ गुलामी जानते हैं और अगर मौका मिले तो बेईमानी भी । कोई कोई नौकर काफ़ी इमानदार भी होते हैं। लेकिन मेरा सन्दर्भ यहाँ यह है की अगर इस मुल्क में आजादी है तो यहाँ नौकरी करने वाले नौकरों की नही बल्कि राष्ट्र हित में कार्य करने वालों की कर्मयोगियों की जरूरत है। लोग पैदा होते हैं , पढ़ाई लिखी करने के बाद "नौकरी" ढूँढने में लग जाते हैं। कोई राष्ट्र हित में अगर सेना में भी भरती हो जाए तो उसकी मानसिकता भी यदि यही होती है की मैं तो सेना में नौकरी रत हूँ, तो इस राष्ट्र की दुर्दशा क्या होगी कोई सोंच भी नही सकता।
आज आए दिन घोटालों और घोटालेबाजों के किस्से और करतूतें सामने आ रही हैं। वजह है नौकर होने की मानसिकता होने का। एक नौकर तो ऐसा होता ही है। कोई इमानदार कोई बेईमान लेकिन अगर जिम्मेदारी हो आजाद भारत को ताकतवर बनाने की तो मुझे लगता है की चोरों के दिल में भी कुछ पल के लिए इस देश के लिए मर मिटने का जज्बा पैदा हो जाएगा। शर्मनाक है ये की माता पिता अपने बच्चे के बारे में ये कहते हैं की "मेरा बेटा तो बहुत अच्छी नौकरी में है। भगवन की दया से और अपनी मेहनत से वो आज जिस मुकाम पर है मुझे उस पर गर्व है।" अगर कोई जवान दिल और जवान खून इस मुल्क के लोगों की तकलीफें दूर करने के लिए समाजसेवा में कदम रख ले या राजनीति में आगे बढ़ने की कोशिश करे, इस राष्ट्र की इमानदार सेवा में लगने का संकल्प ले तो समाज और समाज के ठेकेदार उसको निकम्मा और फालतू का दर्जा दे डालते हैं।
राहुल गाँधी ३९ की उमर में इतना परिपक्व मान लिए जाते हैं की वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन एक राजनैतिक कार्यकर्ता जो कहीं से भी उनसे कम नही सिवा एक बात "विरासत" को छोड़ कर , तो वो चाहे ६० का भी क्यों न हो बच्चा मान लिया जाएगा।
जो लोग राजनीती में हैं वो लोग कान के कच्चे होते हैं ऐसा हमने सुना है और देखा भी है। ऐसा राजा किस काम का जो देखने के लिए कान का उपयोग करता हो ? ऐसे राजा तो अपंग हुए तो आँख रहते अंधे हैं । खैर चाहे किसी भी दल या कुनबे की बात करें लोगों में ख़ुद की असुरक्षा का भय कुछ इस कदर समां चुका है की लोग अपनी परछाई से भी डरने लगे हैं। रही राजा और प्रजा होने की बात तो जो लोकतंत्र में राजा मान लिया गया है दरअसल वो प्रजा का सबसे बड़ा नौकर है। लोकतंत्र में तो प्रजा को राजा का दर्जा हासिल है फिर लाल बत्ती मंत्रियों को किस लिए। और उनके मार्ग में आने वाली जनता को धुप में घंटो खड़े करने का क्या मतलब ? वैसे राजनीत में अन्दर जो है वो भी कम नही । अब सुनिए.... किसी दल के युवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की उमर ५० साल के करीब हो , उनको युवाओं से खतरा नही महसूस होगा तो क्या होगा ? किसी दल के छात्र इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष छात्र हो ही नही तो उसको छात्रों से भय महसूस होगा या नही होगा॥? किसी दल के किसान इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी भी तरह किसान हो ही नही तो उसको किसानो से भय महसूस होगा या नही ? किसी दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनैतिक व्यक्ति हो ही नही तो उस व्यक्ति को राजनैतिक कार्यकर्ताओं से खतरा महसूस होगा या नही ? जरूर होगा। क्योंकि, भय की सिर्फ़ एक परिभाषा है। "जो सन्दर्भ आपकी समझ से परे है वह आपमें भय पैदा करने के लिए पर्याप्त है।" मतलब ये की अगर आप युवा नही रहे तो युवा होने की अनुभूति भी आप में नही होगी। मतलब ये की युवा मन आपकी समझ से परे होगा और आप युवाओं को समझ नही पाएंगे और आपको यही बात भय के प्रभाव में डालने के लिए काफ़ी है। छात्र , किसान , और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के मामले के सन्दर्भ भी इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाते हैं। मतलब ये हुआ की बेखौफ भारत के लिए बेखौफ और इमानदार नेताओं की जरूरत है। जिनकी खून में गर्मी भी हो और कार्यकुशलता भी। आँखों में सपने भी हों और पूरा कर के उन सपनो को जीने की ताकत और जिंदगी के साल भी।
आज भारत की आजादी मानाने की कवायदें फिर शुरू हो गयीं। अनगिनत लोग एक बार फिर राष्ट्र भक्ति में डूब जायेंगे। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, दूसरे के घरों में पैदा हुए अच्छे लगते हैं। उनकी माता पर दूसरी माताओं को गर्व होता है.... लेकिन यदि अपने घर में कोई भगत सिंह पैदा हो गया तो वो आँख की किरकिरी और खानदान की मिटटी पलीद करने वाला ही दिखाई देता है... विधवा विवाह दूसरे के बच्चे करते ही सोभते हैं ... अपने लाल के लिए तो अपने पसंद की बहु ही चाहिए होती है... समाज सुधारक, समाजसेवी, और तमाम फालतू की बकवास करने वाले लोग दूसरों की घरों में ही पैदा होते शोभते हैं... अपने यहाँ तो अच्छी नौकरी करने वाला कमाऊ पूत ही अच्छा लगता है... खास तौर से तब जब घर की माली हालत ख़राब हो... और इस देश की ८० प्रतिशत से भी अधिक जनता की माली हालत ख़राब है तो इस देश में नौकर पसंद करने वाले माँ बाप और नौकरी पसंद पूत पैदा नही होगा तो क्या होगा...?
राजनीत में जो लोग हैं ऊपर बैठे हुए उनको राजा कहलाने की आदत हो गई है... क्योंकि उनको "हूजूर" कहलाना अच्छा लगता है... और वो लोगों को "हूजूर" कहकर "हुज़ूर" न होने का भान देकर ख़ुद में महान होने का भ्रम पाल लेते हैं।
राजनैतिक दल आज के समय में नेता नही गुलाम पैदा करते हैं। किसी भी दल में चले जायें वहां पर वही आया होता है जिसमे आम इंसानों को नेतृत्व देने की भावना होती है लेकिन उन्हें जो सबसे पहला पाठ पढाया जाता है वो यह है की "तुम्हे जो कहा जाए सिर्फ़ वो करो । अपनी सोंच समझ और काबिलियत को अपने पास रखो । दल के दरवाजे आने और जाने वालों के लिए सदैव खुले हैं। मैं तुम्हे पदाधिकारी बनाऊंगा तब तुम पदाधिकारी माने जाओगे। मैं तुम्हे मौका दूँगा तब तुम नेता बन पाओगे। यानि की अगर नेता बनाना चाहते हो तो गुलाम बन जाओ। ठीक वैसे ही जैसे चैन से सोना चाहते हो तो जाग जाओ। " यही मानसिकता पीढीदर्पीधि आगे बढती जा रही है। जो ताकतवर है उसकी गुलामी करने में कैसी शर्म ... ? गुलामी करने से गुलामी करवाने का अधिकार भी तो मिल सकता है... ?वाह रे नेता.... कैसी सोंच है तेरी...? आजादी रस्सिओं को काटने से नही बल्कि सोंच से आती है... विचारों से आती है... और मुल्क सोंच से नौकर है , गुलाम है... क्योंकि अधिकांश लोग आज नौकरी नही मिलने से "बेरोजगार" हैं और नौकरी करना ही इनका परम लक्ष्य है... ये स्वरोजगार करके स्वावलंबी नही बनाना चाहते... ख़ुद को नयी नयी दलीलें देकर थोथी तर्क - वितर्क करके पिछडों में शामिल करवा कर उनका हक भी मार लेने से बाज़ नही आ रहे... जिस रास्त्र के लोग पिछडों में शामिल होने के लिए आन्दोलन करते हों क्या वो राष्ट्र वाकई विकास कर रहा है? और ये आन्दोलन वस्तुतः नौकरी पाने और ऐसी ही मामलों में सुविधाएँ पाने के लिए हो तो ? और वो जो आजाद है जैसे की मैं और हो सकता है की आप भी ... मैं अकेला चल पड़ा हूँ भारत को आजाद कराने अपने कुछ मित्रों के साथ। एक दिन हम कामयाब होंगे जब भारत में नौकर नही कर्मयोगी पैदा होंगे। सैनिक पैदा होंगे, नेता पैदा होंगे ... गुलाम नही।
जय हिंद । जय भारत। जय जनते ।
मंगलवार, 31 मार्च 2009
शरद जी ने जो कहा उस पर एक नजर ....

पटना , २९ मार्च ।
शरद जी ने रविवार को कहा की भारत के जिन लोगों ने स्विस बैंक में रुपए जमा किए हैं , भारत सरकार उनके नाम का तुंरत पता लगाये। इस बारे में वो सर्व दलीय बैठक करे और जरूरत पड़ने पर वो तमाम दूसरे देशों की मदद ले । शरद जी ने इस बात पर चिंता जताई की स्विस बैंक में सबसे ज्यादा धन भारत से जमा हुआ है। यह काला धन है। भ्रष्टाचार के जरिये कला धन जमा किया गया है। उन्होंने कहा की अमेरिका समेत कई ताकतवर देशों के दबाव में क़ानून बना और स्विस बैंक को यह बतलाना जरूरी हो गया की किस देश से कितने रुपए जमा किए गए हैं। एक साल सात महीने पहले यह खुलाशा हुआ की स्विस बैंक में सबसे ज्यादा धन भारत से जमा हुआ है। ४५६ बीलीयान डॉलर यानि ७२ लाख ८० हजार करोड़रुपए स्विस बैंक में जमा हुए हैं । शरद जी ने इस धन को कला धन करार दिया है। शरद जी ने कहा की भारत ने दूसरे देशों से जितना कर्ज लिया है ये धन उससे तीन गुना है । यह धन देश के बजट का ८ गुना है । ६० साल से कुछ लोग देश को लूटने में लगे हैं और अब तक लूटने में लगे हैं और अपने लूट का धन स्विस बैंक में रख रहे हैं। शरद जी अचरज में थे की , जिस देश के ७८ % लोग २० रुपए रोज पर गुजारा करते हैं , वह देश स्विस बैंक में रुपए जमा करने में सबसे आगे है ,अव्वल है। प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी इमानदार हैं ऐसा कहा जाता है... वह उन लोगों के नाम और पते का खुलासा करे जिनहोने स्विस बैंक में पैसे जमा किए हैं। कौन लोग कितनी बार कहाँ कहाँ गए हैं इसकी पड़ताल होनी चाहिए। इस मुद्दे पर जो पार्टी चुप है , उसके पीछे की वजह का पता लगना जरूरी है। उन्होंने कहा की पार्टियों को इस मुद्दे पर गंभीर होना चाहिए । इसके विरोध में हमें गोलबंद होना चाहिए । यह मुद्दा भ्रष्टाचार से जुड़ता है । भ्रष्टाचार बढ़ा है ।
दिल्ली, ३१ मार्चशरद जी की यह पुकार उस हर व्यक्ति के लिए है जिनकी जिंदगी हर तरह की परेशानिओं में घिरी रही लेकिन उनके द्वारा चुने गए उनके प्रतिनिधिओं के द्वारा जमा किए गए धन से स्विस बैंक में धन का अद्वितीय अम्बार लगता चला गया... मैं जानता हूँ की शरद जी ने यहाँ जो कहा वो बिल्कुल सत्य है की लोग ६० वर्षों से अधिक समय से देश को लूटते आ रहे हैं...
अब जनता को जागना होगा.... आज के वक्त में जनता को अपनी वोट की ताकत को समझना बहूत जरूरी है... पहले राजा अपनी माँ की पेट से पैदा होता था और यही सामंती व्यवस्था है..... अब राजा आपके वोट से पैदा होता है ...यही लोक तंत्र है... आपका वोट ही आज के आपके राजा का माई- बाप है ...
आप जनता हैं... आप जनार्दन हैं.... आप तो सब जानते हैं... आपसे क्या छुपा है..? वो लोग जो आज करोड़पति बने बैठे हैं... कल उनके पास खाने को रोटी तक नही थी... रहने को घर नही था... जब वो आपके प्रतिनिधि नही थे... प्रतिनिधि बनने के बाद अचानक उनकी औकात करोड़पति की कैसे हो गई ?
जरा सोंचिये ....सरकार ने उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पुरस्कृत किया नही... आपने उन्हें भेंट स्वरुप कुछ दिया नही... फ़िर उनकेपास इतना धन आया कहाँ से ?
जाहिर है सरकार के द्वारा जो पैसे आपके ऊपर खर्च करने थे वो उन्होंने अपनी बैंक खतों में जमा किए और करते ही चले गए... क्या ये सोंचने का विषय नही की ऐसी कौन सी ललक है इन लोगों में की समाज सेवा के नाम पर राजनीत करने आए और आपके प्रतिनिधि होने के मजबूत दावेदार कहलाने के नाम पर इन लोगों ने करोड़ों रुपए चुनाओ में खर्च करने शुरू कर दिए ? जाहिर है की आज के समय में चुनाव एक व्यवसाय का रूप बन गया है... जहाँ लोग पहले इन्वेस्ट करते हैं और फ़िर मुनाफे समेत अपना धन बटोर लेते हैं.... ५ साल की अवधी में जितना बन पड़ता है लूट लेते हैं... आखीर कहाँ से लाते हैं ये इतने रुपए चुनाव लड़ने में खर्च करने के लिए...?
ये सरकारी सेवक भी कम नही हैं... ये भी आपके ही पैसों से साहब वाली ठाठ बाठ मेंटेन करते हैं.... आपके ही पैसों से ये आपके ऊपर बाबू साहब बन कर बैठे होते हैं... वरना आप तो जानते ही हैं की महीने भर की तनख्वाह में ठीक से घर भी नही चल सकता... लातसाहबी तो दूर की बात है... यानि जिसे जहाँ मौका मिला ... आपको लूटता चला गया....
डा० हरिवंश राय बच्चन ने लिखा था... "अफसर, दफ्तर, फाइल, नोट, सबसे ताकतवर है वोट..." ये याद रखने की चीज है... बस...
जरा सोंचिये... आपका रजा आपके द्वारा चुना जाता है.... यही लोक तंत्र है... तो फ़िर क्या ये आपका अधिकार नही बनता की आप अपने चुने हुए रजा से ये पूछें की ये धन उसने कहाँ से जमा किया...? और आपकी स्थिति बदहाल की बदहाल ही क्यों बनी रह गई ? आपका आपके राजा से हिसाब मांगने का पूरा हक है... हो सकता है की ... वो आम दिनों में आपकी बात को अनसुना कर दें... लेकिन चुनाव के वक्त आप उस से जरूर पूछेंगे और उसको जवाब देना ही होगा...
खैर जवाब से क्या मिलेगा...? वो तो जो खाना था खा चुका... जितना जमा करना था कर चुका... जरा सोंचिये ... जिनके पास रहने को घर नही था... खाने को रोटी नही नसीब होती थी... वो आज बड़े गर्व से घोषणा करता है की मेरे पास तो सिर्फ़ कुछ करोड़ों की संपत्ति है... और आपको यह विश्वास दिलाता है... की उसने पूरी ईमानदारी से अपना व अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे दिया है... सवाल ये उठता है ...की ये संपत्ति तो पहले थी नही ... फ़िर अब कहाँ से आ गई...? अचानक से लोग खानदानी रईस दिखने लगते हैं.... ?
खैर... ये हाल तो चारो तरफ़ है... आप किसे अपना प्रतिनिधि चुनेंगे... ये कैसे तय करेंगे...? वादों ... नारों के नाम पर वोट देने का न तो अब समय रहा है... न आपके नेता आपके हितैषी ही रहे हैं...
कुछ लोग अभी भी बचे हैं... जो गाहे बगाहे आपको जगाने की कोशिश करते हैं.....चाहे सेज जैसे मुद्दे हों या फ़िर विदेशों में धन जमा कर धन्ना सेठ बन कर बैठे होने का मामला हो... पर आप जागें तब न ?
मेरे हिसाब से अपना प्रतिनिधि चुनना बिल्कुल आसान है.... आप सिर्फ़ उसको ही अपना प्रतिनिधि चुने... जिसपर व्यक्तिगत रूप से आपको भरोसा हो...
यह याद रखें ... अगर किसी नें आपके भरोसे को एक बार तोड़ दिया है... तो बार बार भरोसा करने से वो सुधर जाएगा ऐसा बिल्कुल मत सोंचिये... ये अवसरवादी राजनीती है... लोग आपको अपने वादों और मगरमछी आंसुओं के फांस में फांसने में सिद्ध हस्त हैं इसी लिए वर्षों से आपके धन से ही मालामाल होते रहे हैं...
ये नोट कमाने की ही माया है की लोग धड़ल्ले से पार्टियाँ बदलने से भी परहेज नही करते... ताल - मेल में भी परहेज नही करते... मुद्दा सिर्फ़ एक है... खाओ और खाने दो... सब मिलें सब खाएं... कोई वैचारिक पृष्ठभूमि नही... कोई नैतिकता नही... बस कुर्सी और गद्दी... अगर कुछ रह गया तो वो आपका वोट... जो इन्हे भरोसा होता है... की वो तो आंसू बहा बहा कर मिल ही जाएगा... बेचारी पब्लिक करेगी ही क्या... कोई आप्शन भी तो नही जनता के पास... ?
विकल्प है कैसे नही... एक बार जरा खखार के पूछिए ..." हाँ भाई... क्या किए आज तक ....? पिछला बार जितना वादा किए उसको छोड़ दीजिये... ये बतलाईये की आपकी माली हालत पहले से बेहतर हुई की नही...? इस बार चुनाव में कितना खर्च कर रहे हैं...?" या फ़िर आपके ग्राम या मुहल्ले या छेत्र की चौहद्दी ही पूछ लीजिये... लीडर बनने वालों के होश फाख्ता हो जायेंगे मैं शर्त लगा कर कह सकता हूँ...
वैसे आपसे कुछ छुपा भी नही है... जिनकी माली हालत में सुधर दिखे.... उन पर विशेष दृष्टी रखने की जरूरत है... वैसे गुदरी ओढ़ कर घी पीने वाले भी भरे पड़े हैं.... लेकिन इन सब का एक ही इलाज है... काम देखिये... और अपनी अंतरात्मा से फ़ैसला कीजिये... ।
क्या वजह है की कोई गरीब आदमी जो समाज सेवा के रूप में आपकी मदद कर रहा हो ... लाख परेशानिओं को उठा कर भी वो आपकी आवाज बन रहा हो .... आप उसको चुन कर सदन में भेजने की हिम्मत नही उठा पाते ? ... और उनको ही बार बार चुनते हैं... जो वर्षों से आपको लूटते आ रहे हैं....? वजह साफ़ है...
आपका भोलापन ... भोलेनाथ हैं आपलोग... और भस्मासुर हैं ये आपके चुने हुए नुमाईंदे ...आप लहर देखते हैं... कौन जीत रहा है वो देखते हैं... इन अफवाहों में पड़ते हैं... अपनी अंतरात्मा की नही सुनते....
आप एक काम कीजिये...आप जात - पात...धर्म-समुदाय ... पार्टी - दल ... बाहुबली- दबंग इनके नाम पर वोट देना बंद कर दीजिये.... आप सिर्फ़ अपने दिल की आवाज सुनिए ...मैं आश्वस्त हूँ की आप धोखा नही खायेंगे ... आप काम देखिये... अपने नेता की पहचान हर किसी को होती है... किसी के मनवाने से अगर कोई नेता बन गया होता तो ... इस देश में दिग्गज कभी हारते ही नही ... किसी की शकल देख कर ही आपको समझ में आ जाता है की अमुक आदमी आपको धोका देगा...ये दिल ही गवाही दे देता है... आप भी जानते हैं इस बात को ... फ़िर ऐसी कौन सी मजबूरी होती है की हमेशा बेईमान लोग आपको लूट लेते हैं और करोड़ पति बन जाते हैं... और आप अपनी समस्याओं में उलझे हुए... इन लोगों की बात में बार बार आ जाते हैं... या ये अद्वितीय किस्म के चालबाज है....और अव्वल दर्जे के धूर्त हैं...?
बातों पर कम और अपनी अन्तर आत्मा की आवाज पर ज्यादा भरोसा कीजिये.... लोग करोड़ों इस लिए खर्च करते हैं ताकि वो लहर बना सकें की वो जीत रहे हैं... और आपको वो ये अहसास दिलाना चाहते हैं की उनको ही वोट कर देना चाहिए ... नही तो आपका वोट बर्बाद हो जाएगा....ऐसा वो आपको गुमराह करने के लिए करते हैं...ये आपको गुमराह करने के लिए करोडो खर्च करते हैं...
याद रखिये जिस दिन आप ये समझ गए की आपका राजा आपकी मर्जी से चुना जाना है और सिर्फ़ आपको ही चुनना है... उस दिन आपके इमानदार हाथ सिर्फ़ उसको वोट देंगे जो आपका सच्चा प्रतिनिधि होगा...और लोगों की बातों और नारों में फंसने की बजाये ... अपनी इमानदार कोशिश कीजिये बदलाव लाने की... ... क्योंकि आज तक आपकी स्थिति सुधरी नही... सुधरने के बजाये और बदतर हो गई... जाहिर है... की बदलाव की कूंजी आपके ही हाथ में है... आपके वोट की शकल में...
खैर... आप ख़ुद समझदार हैं...
बिल्ली को दूध की रखवाली करने बोलेंगे तो क्या होगा...?
अब भी वक्त है... सोंचिये... इस देश को लूटने वालों को फिर राजा बनायेंगे या कुछ परिवर्तन लाना है...?
मंगलवार, 27 जनवरी 2009
आप सभी भाई बंधुओं ,हमारे देशवासिओं और तमाम मेहमानों को मैं गणतंत्रता दिवस के अवसर पर अपनी हार्दिक बधाई देना चाहता हूँ। कल हमने जो देखा वह अति-आनंदमय व भव्य तो था ही... इस से भी कहीं ज्यादा यह राष्ट्र भक्ति तथा शौर्य से लबरेज था... जवानों की तो बात ही अलग है... मैंने जनता में भी जवानों से ज्यादा बेखौफपन देखा... यह उन कायरों के लिए एक सबक है और एक संदेश भी की हम भारतीय आतंकवाद जैसी कायरतापूर्ण गतिविधिओं से डरने वाले नही..... तमाम धमकियों के बावजूद जनता ने देश के कोने कोने से आकर गणतंत्र दिवस परेड को देखने तथा हमारे विशाल भारत के शौर्य.... पराक्रम.....वैभव.... और अक्षुण अखंडता के प्रदर्शन को निहारा और नम आंखों से हमारे स्वतंत्रता नायकों (जवानों) व स्वतान्रता सेनानियों के उपकार के प्रति आभार प्रकट किया... वाकई यह केवल राष्ट्रभक्ति का जूनून है जिसने जनता को मौत के खौफ से भी आजाद कर दिया.... लोगों ने दिखा दिया की भारतवर्ष की मिटटी हर प्रान्त के लोगों में खून बनकर दौड़ रही है..... और शरीर में जब तक ये रक्त कायम बचा है... मिटटी के आभार को चुकाने के लिए मौत से भी हम भारतीय लड़ने को तैयार रहते हैं और रहेंगे.... धन्य है यह देश हमारा.... जिसने नौनिहालों को भी शौर्य और पराक्रम से भर रखा है... मैं नम आंखों से .... अबने ह्रदय में अगाध आस्था लिए .... भारत माँ को आश्वस्त करना चाहता हूँ की इसकी जनता ... इसके नेता.... और इसके बुद्धिजीवी.... तथा समस्त क्रियाशील भारतवासी हमारे रक्षा नायकों के साथ खड़े हैं... हमे कोई भी परस्त नही कर सकता... क्योंकि हमने मौत के खौफ पर भी विजय पा ली है....
जय हिंद । जय भारत। जय जवान । जय किसान । जय विज्ञानं । जय जन ते । जय जनते

