बहुधा ये प्रश्न उठता है। राजनीती में सबसे महत्त्वपूर्ण क्या है ? मैं समझता हूँ सबसे पहले हम सम्बन्धों कि प्रगाढ़ता को तवज्जो दें तो सबसे अधिक उत्साहवर्धक एवं स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक राजनीती कर सकने में सफल होंगे। क्योंकि जो सबसे ज्यादा कष्टकारक तत्त्व हमें राजनीती में देखने को मिलती है वो है हर सफलता के बाद किसी प्रिय जन से सम्बन्धों का टूट जाना।
अपने सम्बन्धों कि अनुकूलता पर विशेष ध्यान देने कि जरूरत है क्योंकि , राजनीती अकेले की जाने वाली कोई व्यवसाय या खेल नहीं अपितु सम्मिलित रूप से राज काज कि सुदृढ़ व्यस्था एवं जन कल्याण को स्थापित करने की विधा है।
हम अनावश्यक रूप से खुद को महत्व देने में इतने मसगूल हो जाते हैं कि हर बात को अपने नफा नुक्सान से तोलने लगते हैं और इस बात से कोसों दूर चले जाते हैं कि हम किस वजह से साथ चल रहे हैं और किस वजह से साथ चलते रहेंगे। खुद को मनगढंत सेनापति , राजनायक , नेता या समाजसेवी समझ लेना और बात है और खुद को उपरोक्त विशेषणों पर खरा साबित करना और बात है।
कटू परन्तु सत्य यही है कि जो लोग राजनीती को व्यवसाय मान के राजनीती में निश्चित लाभ के हेतु प्रवेश करते हैं , वस्तुतः राजनीती उनके लिए नहीं है ये बात अब धीरे धीरे सामने आ जायेगी। जनतंत्र कि स्थापना के कई मूलभूत सिद्धांतों में से एक है जनकल्याण एवं बहुगणवाद। अल्पकालिक राजनीती वर्गवाद और क्षेत्रवाद से प्रभावित अथवा संचालित एवं फलित दिख सकती है परन्तु दीर्घकालिक राजनीती हमेशा के लिए उदारवाद और जनकल्याण से ही प्रेरित रहेगी। हमें ध्यान ये देना है कि हम मूलभूत सिद्धांतों से न भटकें। सफलताओं को देख कर नए मानदंडों कि पुनर्रचना में उन्मुख होने कि बजाय खुद के अस्तित्व को समझ कर खुद के द्वारा जनसामान्य को सर्वोत्तम सेवा देने के प्रयोग में लग जाएं , सम्भवतः यह एक चिरंजीवी राजनीती कि नीव होगी और नेता सर्व विजयी एवं सार्वभौमिक होगा।
हम जैसा सोंचते हैं वैसा ही बन जाते हैं। मैने कई लोगों को "आप " की सफलता के बाद कहते सुना - "हम भी अगर आप पार्टी ज्वाइन कर लेते तो आज विधायक तो जरूर बन गए होते " , मुझे अफ़सोस इस बात से हो रहा है कि अभी तक ऐसे नवसिखिओं को राजनीती कि "र" भी समझ नहीं आयी। कुछ लोग तो अरविन्द केजरीवाल से दोस्ती गाढ़ने में लग गए हैं तो कुछ लोग केजरीवाल को अपने प्रोफाइल से प्रभावित कर उसके साथ सम्मिलित होने के रास्ते ढूंढने में लग गए हैं। कुछ लोग केजरीवाल कि सफलता से इतने उत्साहित हो गए हैं कि वो किसी कीमत पर आगामी लोक सभा चुनावों में उसकी पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए खुद को प्रस्तुत करने अथवा करवाने के कई उपायों को लगाने में लग गए हैं।
मूल मंत्र एक ही है , जनता का विश्वास।
केजरीवाल को जनता का विश्वास मिला क्योंकि उसने इस विश्वास को हासिल करने के लिए खुद को उनके बीच रखा। हर क्षेत्र कि समस्या अलग थी लिहाज़ा अलग अलग अजेंडे पर अलग अलग इलाकों में चुनाव लड़े गए। राजनीती ये नहीं होती कि आप सत्ता में आ जाओ। राजनीती ये होती है कि आप जनता कि भावनाओं से खुद के एजेंडों को जोड़ दो। और ये तब होगा जब आपका एजेंडा जनता का एजेंडा होगा। वही हुआ और केजरीवाल को समर्थन और विश्वास दोनों मिला। अब केजरीवाल को ब्रांड इमेज बना कर मीडिया और अन्य नवसिखिये नेतागण खुद का कल्याण करने में लग जाएँ तो इसमें न तो जनता का दोष होगा न केजरीवाल का लेकिन सत्यानाश सिर्फ एक चीज का होगा वो है जनता का प्रकट विश्वास जो उसने व्यवस्था परिवर्तन के लिए दिखलाया है।
जनता दल (यू ) ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में अपनी महत्वकांक्षा में मुह कि खाई है। पता नहीं कितने लोग इस चोट को खाने के लिए खुद को जिम्मेदार मानते होंगे। भाजपा एवं अन्य दलों कि भी यही कहानी होगी। कांग्रेस के लिए तो सदमा काफी गहरा रहेगा लेकिन जो बात स्वस्थ राजनीती कि ओरे इशारा कर गयी वह ये कि खुद को बड़ा समझने वाला हमेशा से खुद के लिए विखंडन अथवा नाश को ही न्योता देता है। जो लोग खुद को जनता से अलग यानि विशेष समझने में लगे थे इतिहास गवाह है उनका क्या हश्र हुआ है।
खैर अब बात ये आती है कि हम सुधार कि शुरुआत कहाँ से करें ? सबसे पहले हम सबको विनम्रता धारण करने कि आवश्यकता है। अपने सम्बन्धों पर ध्यान देने कि आवश्यकता है और सहनशीलता बरतने कि आवश्यकता है।
गौर से देखेंगे तो जदयू भाजपा के सम्बन्धों कि कटुता एवं अंततः सम्बन्ध विच्छेद ने एक दूसरे को काफी नुक्सान पहुँचाया है जो आने वाले दिनों में और भी मुखर होकर दिखेगा। कांग्रेस सहित अन्य दलों में भी आपस के सम्बन्धो के बीच खाई बढ़ने कि वजह से उन्हें भी काफी नुक्सान देखने में आये हैं। और कई लोग तो व्यक्तिगत कारणो से खुद को दयनीय स्थिति में "मनगढंत मालिक" बना के रखने को विवश हैं, भले ही उन्हें कुछ आता जाता हो अथवा नहीं ये और बात है।
जो व्यक्ति अथवा दल अपने हितैषिओं कि क़द्र नहीं करता उसका क्या सुनिश्चित होता है ? कौन कह सकता है ? आप खुद समझदार हैं ;
…… क्रमशः
अपने सम्बन्धों कि अनुकूलता पर विशेष ध्यान देने कि जरूरत है क्योंकि , राजनीती अकेले की जाने वाली कोई व्यवसाय या खेल नहीं अपितु सम्मिलित रूप से राज काज कि सुदृढ़ व्यस्था एवं जन कल्याण को स्थापित करने की विधा है।
हम अनावश्यक रूप से खुद को महत्व देने में इतने मसगूल हो जाते हैं कि हर बात को अपने नफा नुक्सान से तोलने लगते हैं और इस बात से कोसों दूर चले जाते हैं कि हम किस वजह से साथ चल रहे हैं और किस वजह से साथ चलते रहेंगे। खुद को मनगढंत सेनापति , राजनायक , नेता या समाजसेवी समझ लेना और बात है और खुद को उपरोक्त विशेषणों पर खरा साबित करना और बात है।
कटू परन्तु सत्य यही है कि जो लोग राजनीती को व्यवसाय मान के राजनीती में निश्चित लाभ के हेतु प्रवेश करते हैं , वस्तुतः राजनीती उनके लिए नहीं है ये बात अब धीरे धीरे सामने आ जायेगी। जनतंत्र कि स्थापना के कई मूलभूत सिद्धांतों में से एक है जनकल्याण एवं बहुगणवाद। अल्पकालिक राजनीती वर्गवाद और क्षेत्रवाद से प्रभावित अथवा संचालित एवं फलित दिख सकती है परन्तु दीर्घकालिक राजनीती हमेशा के लिए उदारवाद और जनकल्याण से ही प्रेरित रहेगी। हमें ध्यान ये देना है कि हम मूलभूत सिद्धांतों से न भटकें। सफलताओं को देख कर नए मानदंडों कि पुनर्रचना में उन्मुख होने कि बजाय खुद के अस्तित्व को समझ कर खुद के द्वारा जनसामान्य को सर्वोत्तम सेवा देने के प्रयोग में लग जाएं , सम्भवतः यह एक चिरंजीवी राजनीती कि नीव होगी और नेता सर्व विजयी एवं सार्वभौमिक होगा।
हम जैसा सोंचते हैं वैसा ही बन जाते हैं। मैने कई लोगों को "आप " की सफलता के बाद कहते सुना - "हम भी अगर आप पार्टी ज्वाइन कर लेते तो आज विधायक तो जरूर बन गए होते " , मुझे अफ़सोस इस बात से हो रहा है कि अभी तक ऐसे नवसिखिओं को राजनीती कि "र" भी समझ नहीं आयी। कुछ लोग तो अरविन्द केजरीवाल से दोस्ती गाढ़ने में लग गए हैं तो कुछ लोग केजरीवाल को अपने प्रोफाइल से प्रभावित कर उसके साथ सम्मिलित होने के रास्ते ढूंढने में लग गए हैं। कुछ लोग केजरीवाल कि सफलता से इतने उत्साहित हो गए हैं कि वो किसी कीमत पर आगामी लोक सभा चुनावों में उसकी पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए खुद को प्रस्तुत करने अथवा करवाने के कई उपायों को लगाने में लग गए हैं।
मूल मंत्र एक ही है , जनता का विश्वास।
केजरीवाल को जनता का विश्वास मिला क्योंकि उसने इस विश्वास को हासिल करने के लिए खुद को उनके बीच रखा। हर क्षेत्र कि समस्या अलग थी लिहाज़ा अलग अलग अजेंडे पर अलग अलग इलाकों में चुनाव लड़े गए। राजनीती ये नहीं होती कि आप सत्ता में आ जाओ। राजनीती ये होती है कि आप जनता कि भावनाओं से खुद के एजेंडों को जोड़ दो। और ये तब होगा जब आपका एजेंडा जनता का एजेंडा होगा। वही हुआ और केजरीवाल को समर्थन और विश्वास दोनों मिला। अब केजरीवाल को ब्रांड इमेज बना कर मीडिया और अन्य नवसिखिये नेतागण खुद का कल्याण करने में लग जाएँ तो इसमें न तो जनता का दोष होगा न केजरीवाल का लेकिन सत्यानाश सिर्फ एक चीज का होगा वो है जनता का प्रकट विश्वास जो उसने व्यवस्था परिवर्तन के लिए दिखलाया है।
जनता दल (यू ) ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में अपनी महत्वकांक्षा में मुह कि खाई है। पता नहीं कितने लोग इस चोट को खाने के लिए खुद को जिम्मेदार मानते होंगे। भाजपा एवं अन्य दलों कि भी यही कहानी होगी। कांग्रेस के लिए तो सदमा काफी गहरा रहेगा लेकिन जो बात स्वस्थ राजनीती कि ओरे इशारा कर गयी वह ये कि खुद को बड़ा समझने वाला हमेशा से खुद के लिए विखंडन अथवा नाश को ही न्योता देता है। जो लोग खुद को जनता से अलग यानि विशेष समझने में लगे थे इतिहास गवाह है उनका क्या हश्र हुआ है।
खैर अब बात ये आती है कि हम सुधार कि शुरुआत कहाँ से करें ? सबसे पहले हम सबको विनम्रता धारण करने कि आवश्यकता है। अपने सम्बन्धों पर ध्यान देने कि आवश्यकता है और सहनशीलता बरतने कि आवश्यकता है।
गौर से देखेंगे तो जदयू भाजपा के सम्बन्धों कि कटुता एवं अंततः सम्बन्ध विच्छेद ने एक दूसरे को काफी नुक्सान पहुँचाया है जो आने वाले दिनों में और भी मुखर होकर दिखेगा। कांग्रेस सहित अन्य दलों में भी आपस के सम्बन्धो के बीच खाई बढ़ने कि वजह से उन्हें भी काफी नुक्सान देखने में आये हैं। और कई लोग तो व्यक्तिगत कारणो से खुद को दयनीय स्थिति में "मनगढंत मालिक" बना के रखने को विवश हैं, भले ही उन्हें कुछ आता जाता हो अथवा नहीं ये और बात है।
जो व्यक्ति अथवा दल अपने हितैषिओं कि क़द्र नहीं करता उसका क्या सुनिश्चित होता है ? कौन कह सकता है ? आप खुद समझदार हैं ;
…… क्रमशः

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