
५ जुलाई २०१० को भाजपा ,जदयू , सपा व वामदलों समेत सम्पूर्ण विपक्ष के द्वारा आयोजित बंद कितना कारगर रहा ये तो वक़्त बतलायेगा लेकिन इस बंद कि कुछ बातें खास रही... पहला ये कि कांग्रेस कि केंद्र सरकार को ये तो पता चल ही गया होगा कि सम्पूर्ण विपक्ष इस बात कि ताक में है कि बस सेंध लगे और सरकार इनकी बने. लेकिन कांग्रेस को ये नहीं समझ में आता कि जनहित के विरुद्ध चलकर वो कुछ भी हासिल नहीं कर सकती... कांग्रेस जनविरोधी नीतियाँ लागू कर कब तक जनता को बेवक़ूफ़ बनाएगी? भाजपा,जदयू, तो महत्वपूर्ण भूमिका में दिखे लेकिन जदयू और भाजपा के बीच का शीतयुद्ध भी कहीं न कहीं गैरजिम्मेदार नेताओं और कार्यकर्ताओं कि करतूतों कि वजह से सामने आ रहा है जो कांग्रेस,राजद,बसपा और अन्य विरोधी पार्टिओं के लिए शुकून भरा सन्देश दे रहा है...
मोदी कोई फैक्टर नहीं... न ही नितीश कोई फैक्टर हैं.... फैक्टर तो विचारों का होता है व्यक्तिओं का नहीं.... नितीश ने विकास किये लेकिन अपने तरीके को प्राथमिकता देकर... मोदी ने विकास किये लेकिन अपने भाजपाई तरीके से... अब कौन सा फैक्टर जनता चाहती है अपने विकास के लिए ये जनता पर छोड़ देना ज्यादा उचित है बनिस्पत जनता को गुमराह करने के... मैंने भाजपा के किसी कार्यकर्ता को कहते सुना कि, जैसे भगवान् राम पूजनीय हैं वैसे ही भाजपा के लिए मोदी जी हैं... मैं उस कार्यकर्ता को गलत कहने के बजाये उसकी शिक्षा दीक्षा को दोषी मानता हूँ.... मानव पूजक समाज ही कई कूरीतिओं का जन्मदाता है... मोदी जी कि महानता है कि कार्यकर्ता उन्हें इस रूप में देखते हैं...
नितीश जी को भी गुड खाए और गुल्गुल्ले से परहेज करने से बचना चाहिए....
लेकिन गडकरी जी के जैसे विचार हैं ... और जैसी वो हरकतें कर रहे हैं... उस हिसाब से नितीश जी की निति भाजपा को बिहार में लेकर सही ही है... नितीश जी विकास पुरुष तो हैं ही ... इसका श्रेय भी उनको तब ही मिलेगा जब वो अपनी बातों को सही तरीके से रख सकेंगे... सुशिल मोदी जी बिहार के भाजपा के कर्णधार हैं.. और अब सी पी ठाकुर खेवनहार बने हैं... बिहार की जनता... दिमाग से पैदल नहीं... बल्कि काफी समझदार है... यहाँ दकियानूसी और बेवजह की कहानियाँ सुनाने और बनाने की बजाये... लोगों को अपने मुख्या अजेंडे पर केन्द्रित रखना चाहिए और विकास और कल्याण कार्यों के द्वारा जनता का दिल जितने की कोशिश करनी चाहिए....
लेकिन एक ओर अगर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष को उनकी उपलब्धि और उनके वचनों के माध्यम से तोल के देखा जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि या तो उन्हें सस्ती लोकप्रियता बटोरने का शौक है.... या फिर उल जलूल बातें और बयान देकर विवादों में बने रहने का शौक... लेकिन जनता गडकरी जी के शौक से इत्तेफाक नहीं रखती... और न ही गडकरी जी को जनता के हितों कि अनदेखी करके चलने का हक बनता है... अभी हाल ही में उन्होंने अफजल गुरु को कांग्रेस का दामाद कह डाला... उधर कांग्रेस सांसद दिग्विजय जी कि वल्दियत पूछ डाली... जिसकी वजह से उन्हें भाजपा के एक समर्पित नेता से हाथ धोना पड़ा.. लेकिन हो सकता है कि गडकरी जी के भाजपा को ताकतवर बनाने का ये कोई हथियार हो... लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं दीखता... सिवा इसके कि किसी भी दल विशेष को एक फूहड़ नेतृत्व नहीं सुघढ़ नेतृत्व कि जरूरत थी है और रहेगी... चाहे वो दल कोई भी हो... कांग्रेस हो या भाजपा या फिर जदयू ही क्यों न हो..
अगर एन डी ए कि संकल्पना पर चलना है तो एक दुसरे को प्राथमिकता दे कर चलना होगा... भाजपा हो या जदयू दोनों को ही एकसाथ चलने के लिए मानसिक तौर पर तैयार हो कर चलना पड़ेगा.... पिछले वर्ष मैं लोकसभा चुनावों के दौरान उन्नाव में था... वहां से जदयू के राष्ट्रीय महासचिव जावेद रज़ा प्रत्याशी थे.... लेकिन भाजपा ने वहां एन डी ए कि संकल्पना को ठुकरा कर अपना प्रत्याशी उतारा था.... जाहिर है कि यह तो एक लोकसभा क्षेत्र कि बात थी... लेकिन समझने वाली बात ये है कि कई जगहों पर जहाँ भाजपा का मोह रहा वहां उसने प्रत्याशी खड़े किये.... एन डी ए को ताख पर रखकर...
हाल ही में जदयू कार्यकर्ताओं और नेताओं ने दिल्ली में गडकरी जी का पुतला दहन कर दिया ... सारा मामला बिहारी और उत्तर -भारतियों के ऊपर दिए गए तल्ख़ और गैरजिम्मेदाराना बयानों को लेकर बना था जो गडकरी जी ने दिए थे.... गडकरी जी ने कहा था कि बिहार और उत्तर भारत के लोगों कि वजह से दिल्ली और महाराष्ट्र कि स्थिति नाजुक बनी हुई है और इनकी ही वजह से वहां कई प्रकार कि समस्याएं पैदा हो गयी हैं... जिनमे पेयजल और अन्य समस्याएँ शामिल हैं.... गडकरी जी के हिसाब से ये जनसमूह उन दो प्रदेशों के विकास को बाधित करने वाला प्रथम करक है ... अतः इन्हें वहां से विस्थापित कर दिया जाये...
मुझे हार्दिक तकलीफ हो रही है इस बात को एक बार फिर से कहते हुए.... लेकिन ऐसी नौबत ही क्यों आयी...? जाहिर है कि कोई भी दल जो राष्ट्र विरोधी बयान देगा... या राष्ट्र विरोधी , संविधान विरोधी... या जनविरोधी कृत्या करेगे जदयू उसका पुरजोर विरोध करेगा... संसद से लेकर सड़क तक आन्दोलन किया जायेगा और यही उचित है... बेहतर राष्ट्र निर्माण के लिए भी और जनता के स्वाभिमान को जिन्दा रखने के लिए भी... जाहिर है कि जदयू नीतिगत तरीके से सही थी.... कोई भी दल राष्ट्र को बांटने और अलगाववादी सोंच को बढ़ावा देने कि मानसिकता के साथ चल कर राष्ट्र का हित नहीं कर सकता ... जदयू के सांसदों ने इन्ही मुद्दों पर लोक सभा से इस्तीफा दे दिया था...
भाजपा ,कांग्रेस और राजद के नेता और कार्यकर्ता ये समझ कर चलते हैं कि हिंदुस्तान कि जनता इंडिया टीवी कि दर्शक भर है... जिसपर उड़ने वाला आदमी ... अनोखा शैतान ... और श्रीष्टि ख़त्म हो जाने के किस्से दिन भर दिखलाये जाते हैं... मतलब कि अफवाहों को हकीकत मान लेने वाली जनता....
खैर गडकरी जी के पुतला दहन पर भाजपा के किसी भी नेता नें इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखलाई , ये उनलोगों कि राजनैतिक परिपक्वता का द्योतक है....लेकिन १० मार्च २०१० को होने वाले धरने प्रदर्शन में उन्होंने जदयू के कार्यक्रम को फिस्सड्डी घोषित करने के लिए उन्होंने अपना कार्यक्रम उसी दिन को रखा और जदयू के द्वारा तय दिल्ली के उसी स्थानीय जंतर मंतर के स्थान पर रखा.... जाहिर है कि ये प्रतिस्पर्धा कि सोंच अच्छी तो है लेकिन ओंछी है और एन डी ए कि संकल्पना के लिए घातक है.... क्योंकि १० मार्च को होने वाले कार्यक्रम कि घोषणा शरद जी ने काफी पहले कर दी थी... और भाजपा को इसकी खबर भी थी.. इस कार्यक्रम को प्रतिशोध कि भावना से ग्रसित होकर करने के बजाये एन डी ए का साझा कार्यक्रम बनाया जा सकता था या फिर भाजपा किसी और तिथि को अपना कार्यक्रम रख सकती थी... अथवा जदयू से अपने कार्यक्रम को और आगे कि तिथि तक बढ़ाने कि बात कह सकती थी अथवा आग्रह कर सकती थी .... जदयू अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव कि बातों पर तो चलेगी ही .. चाहे तूफ़ान आये या जलजला .... दिल्ली के प्रदेश अध्यक्षों को एन डी ए कि संकल्पना पर सोंच रखनी चाहिए थी...
लेकिन कैसा रंग तेरा है.... ? भाजपा भी नहीं गदानती न ही जदयू गदानती है... मामला सिर्फ और सिर्फ संख्या बल का है... जो ज्यादा ताकत में है वो दुसरे को कुछ नहीं समझता .... लेकिन अगर लड़ाई विचारों और जनता के मुद्दों कि हो तो हंसुआ के विवाह में खुरपा के गीत गाने से बेहतर है कि साझी रण-नीति पर ध्यान दिया जाए और जनता के हितों कि अनदेखी न कि जाए ....
दोनों दल एक यौगिक नहीं वरन एक मिश्रण के जैसे काम कर रहे हैं..... एन डी ए एक मिश्रण कि जगह एक यौगिक तो नहीं बन सकता ... अपितु इसमें अब भी सुधार कि बड़ी गुंजाईश है....
कांग्रेस कि सरकार चाहे जो करती रहे .... लोग बंद को कितना भी सफल मान कर खुश होते रहें ... कोई सुधार तब तक नहीं आएगा ... जब तक सत्ता पक्ष विपक्ष को इतना ताकतवर न मान ले कि वो तत्काल सत्ता पलट कर सकता है....
अभी हाल ही में कांग्रेस कि सरकार गिर जाने कि पूरी सम्भावना थी ... राजद और बसपा ने अपने पत्ते कुछ इस तरह खोले कि सरकार बच गयी ... ये जनता के साथ धोखा है और ऐसे दलों के द्वारा एक कमजोर विपक्ष बनाने कि संगीन धोखेदारी कि भूमिका को जनता माफ़ न करे तो उनका ज्यादा उज्जवल भविष्य हो सकता है....
महंगाई तो एक ऐसा मुद्दा है जो हमेशा से दायाँ या सुरसा कि भूमिका में लोगों को ही अपना ग्रास बनाता रहा है.... परन्तु ये बंद सत्ता के मद में चूर बैठे राजनेताओं को डरा सके तो ही इसकी सफलता आंकी जानी चाहिए अन्यथा लोगों को चुप होकर बैठ जाना उचित नहीं....
जहाँ तक कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का सवाल है तो वो इतना तो मान कर बैठे हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला .... प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत कई मंत्रिओं के महंगाई को नियंत्रिक न करने के मामले में दिए गए बेबाक बयान .... इसी ओर इशारा करते हैं... कागज पर आंकड़ों के खेल को तो मंत्री , उद्योगपति और मुनाफाखोर ही जाने ...
जनता कि तो थाली में ४ कि जगह अगर १ रोटी आएगी तो भूखो मरने को तो बाध्य वही है न....? यहाँ तो एक रोटी भी नसीब नहीं थी.... उसपर से महंगाई .... खैर भारत बंद एक अचूक हथियार हो सकता है... यदि जनता वाकई अपने आप को शामिल करके सरकार को धिराए और कहे कि ... लोकतंत्र .. मूर्खों पर किया जाने वाला शासन नहीं बल्कि लोहे का वो चना है जिसे चबाने में पीढियां ख़तम हो जाती हैं लेकिन हाथ कुछ नहीं लगता ...
मुझे तो प्रकाश झा कि फिल्म राजनीती को देखने के बाद हंसी आती है कि उन्होंने राजनीती का एक अक्षर भी नहीं सिखा ... और जनता को महा बेवक़ूफ़ घोषित कर दिया ... सुना है मैंने कि उनकी फिल्म हिट हो गयी है.... ये जनता कि हार है... ऐसे फिल्मो ने ही देश का बेडा गर्क करने में अपनी थोड़ी ही सही लेकिन महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है.... सस्ती लोकप्रियता बटोरने कि चाहत ही इंसान से कई घिनौनी हरकतें करवाती है... वो राजनेता हों ... या फ़िल्मकार ... अगर उनकी बातों से जनता सीधी सरोकार रखती है तो उन्हें चाहिए कि वो पूरी जिम्मेदारी से बोलें ... कार्य करें और अपना जीवन वैसा बनायें ....
लालू जी अपनी सम्मान जनक स्थिति के हिसाब से कुछ ज्यादा ही लट के पट बोल देते हैं और लोग हँसते रहते हैं.... किसी को न कोई लाज आती है न शर्म .... बेतुकी बातों पर हँसना भी बेवकूफी है ... आई पी एल विवाद पर बोलने के दौरान भरे संसद में लालू जी ने कहा ..."यादव का बेटा तौलिया ले कर मुह पोछने टीम में गया है क्या ...? जब संसद में लालू जी ने यह कहा था तो उन्हें यह सोंचना चाहिए था कि इस बात को कह कर वो क्रिकेट के खेल, खिलाडी, खेल भावना और उस प्रदेश का अपमान कर रहे हैं जिस प्रदेश के वो क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष हैं... खिलाडी में अगर खेल भावना नहीं होगी तो क्या वो अमर्यादित सांसदों कि भांति... बल्ले और गिल्लियां तोड़ते और एक दूजे पर भद्दे और गंदे आरोप प्रत्यारोप लगा कर खेल को सम्मान प्रदान करेंगे? जैसे हमारे सम्मानित सांसद संसद कि मर्यादा को मिटटी में मिला कर करते हैं ? शायद ही किसी ने इस बात को गंभीरता से लिया होगा.... लालू जी ने सांसद होने के नाते संसद का अपमान किया था... खुद को किसी जाती विशेष का बतलाकर ... क्योंकि जनप्रतिनिधि किसी एक जाती का नहीं... वरन सम्पुर्ण जनता का होता है.... व्यक्तिगत स्वार्थ का पुजारी नहीं बल्कि राष्ट्र और समाजहित कि बात का पक्षधर होता है....और चुकी वो जन प्रतिनिधि हैं... उन्हें जात पात और निजी भावनाओं से ऊपर उठ कर अपने क्षेत्र कि जनता के बारे में सोंचना चाहिए.....
गैरजिम्मेदार हरकतें कभी भी शोभनीय नहीं होती ... चाहे किसी के द्वारा कि गयी हों ...
मीडिया खुद को चौथा स्तम्भ मनवाने के लिए व्याकुल तो रहती है... उसे खुद में झांक कर देखना चाहिए कि वो जनता को क्या सन्देश देती है.... शरद जी का आक्रोश मीडिया के ऊपर जायज़ था.... बेवकूफी भरे घटनाओं पर केन्द्रित होकर उसको प्राथमिकता देकर सस्ती और भोंडी टी आर पी बटोरने के चक्कर में मीडिया भी कई बार गैर जिम्मेदार दिखती है.... ये गलत है और ये राष्ट्र के साथ धोखा है... जनता के साथ धोखा है.... लोगों के विचार अलग हो सकते हैं.... लेकिन जिम्मेदारिओं के निर्वहन में कोताही ... हमेशा दंडनीय है... अपराधियों को पकड़ने के लिए .. कहाँ कहाँ क्लोज़ सर्किट कैमरे लगाये गए हैं इसको दिखलाने का क्या मतलब ? मीडिया को अपनी भूमिका महत्त्वपूर्ण बनानी होगी ... खबरों को सनसनीखेज बना कर परोसने कि बजाये... उन्हें ख़बरों के महत्व पर ध्यान देना होगा...
कल के बंद के दौरान.... कार्यकर्ताओं कि भिडंत , बार बालाओं का ठुमका .. ये गैर महत्वपूर्ण विषय थे .... जनता को इनसे सरोकार नहीं था बल्कि ... जनता के लिए ये ज्यादा महत्वपूर्ण था कि केंद्र सरकार कि इस बंद पर क्या प्रतिक्रिया रही.... किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया या नहीं...? परन्तु मीडिया इस यक्ष प्रश्न के आस पास भी फटकती नहीं दिखी... वह ठुमके और भाजपा जदयू झंझट दिखलाने में व्यस्त रही...
नाकारात्मक समाचार नकारात्मक मीडिया को ही इन्गीत करती है... मीडिया की सार्थकता सार्थक समाचारों से सही सिद्ध होगी... अज हो या कल हो... .... किसी चैनेल वाले ने तत्काल किसी भी विभाग के मंत्री या किसी सत्ता पक्ष के व्यक्ति से बातचीत नहीं कि और उनकी प्रतिक्रिया नहीं ली ... जनता जो देखना चाहती थी वो डांस नहीं बल्कि असर था...
गैर्जिम्मेदारियां बर्दाश्त करने का अब वक़्त नहीं रहा.... चाहे वो कोई भी हो... विधायीका .. न्यायपालिका ... कार्यपालिका .... या कोई और .... जनता आज नहीं तो कल ... सब कुछ उखाड़ फेकेगी ... उदासीनता तो शुरू हो ही गयी है.... अब बारी केवल तिरस्कार कि है....
अराजकता कि स्थिति के लिए जिम्मेदारी कौन कौन लेंगे यही देखना है... राजनैतिक दल .. सरकार या मीडिया ...?? किसी भी व्यक्ति, दल अथवा संगठन को मुगालते में रहने कि जरूरत नहीं कि जनता धर्म चाहती है या रोटी... जाहिर है जनता रोटी चाहती है... धर्म से आचरण आता है... रोटी से जान ... जान बचाना किसी भी जीव कि प्राथमिकता है इस लिए हम धर्मनिरपेक्ष और जनवादी राष्ट्र कि कल्पना करते हैं और जनवादी विचार के प्रखर प्रहरी बनाने कि ओर अग्रसर रहना हमारा पहला धर्म होना चाहिए....
लोहिया जी के शब्दों में कहें तो ..."राजनीती अल्पकालीन धर्म है और धर्म दीर्घकालीन राजनीती..."
साथ ही मैं यह मानता हूँ कि धर्म जनता को नैतिकता प्रदान करती है जबकि राजनीती उसको भौतिक और सामाजिक सुविधाएँ प्रदान करती हैं... इस लिए धर्म आस्था का विषय है और राजनीती विश्वास का.... विश्वासघात सर्वथा निंदनीय है... विश्वासघात कि सजा जनता खुद तय कर लेगी... हमें तो विश्वासपात्र बानने और विश्वास पर खरा उतरने कि कोशिश करनी चाहिए...
II जय हिंद, जय भारत, जय जनते II
आर. के. जुगनू

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