
विलासपुर (म० प्र०), १७ अप्रैल २०१०। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों में एक गिने जाने का सौभाग्य मीडिया को है। या मुझे तो यूँ लगने लगा है की जबरन कुछ लोग मीडिया में सिफत इसी लिए आ जाते हैं की वो चौथे खम्भे का हिस्सा बनकर व्यवस्था से तोल-मोल करके अपना उल्लू सीधा कर सकें। बाजारवाद हर जगह हावी है तो फिर मीडिया इस से अलग क्यों रहे? लोग स्वतंत्र लेखन करने का बहाना या यूँ कहें की ढोंग तो करते ही हैं... लेकिन इस हद तक गैर जिम्मेदार हो जायेंगे ये सोंचने समझने से परे रहने वाली बात लगती है...
अभी हाल ही में, इच्छाधारी संत का मामला मीडिया ने जिस तरह से उछाला और करोड़ों के वारे न्यारे किये, लोग यानि आम जनता देखती रही... सरकार और न्यायपालिका, पुलिस और प्रशाशन किन्कर्त्व्यविमुध होकर इस निकम्मेपन को झेलती रही। मीडिया की गैरजिम्मेदाराना हरकतों का खामियाजा हम पहले भी भुगत चुके हैं ... ताज होटल पर आतंकवादी गतिविधिओं का मामला सबके सामने है। पता नहीं कहाँ कहाँ से लोग समाचार वाचक उठा कर ले आते हैं... जिन्हें बोलने तक का सहूर नहीं मालूम। चीख चीख कर बोलते हैं, अनर्गल - असभ्य भाषा का प्रयोग करते हैं... जितनी बेशर्मी से वह पेश आते हैं... उतने ही खुश दीखते हैं... पता नहीं क्या हो गया है बुद्धिजीवी वर्ग को ? पता नहीं लोग इतना चुप क्यों हैं ?
आज मीडिया नें एक ऐसा माहौल बना दिया है की जहाँ हमारे देश की संस्कृति खतरे में है... एक वरिष्ठ पत्रकार नें तो यहूदी, और इस्लाम के आधार पर हिन्दू धर्म के लिए भी एक ऐसी व्यवस्था कायम करने की बात कह डाली जिसमे धार्मिक गुरु होने के लिए धार्मिक विश्वविद्यालय में पढाई करके फिर डिग्री लेने की प्रारंभिक आवश्यकता हो जाएगी। कौन समझाए इन लोगों को की हिन्दू धर्म इतना अथाह सागर के जैसा है जिसे किसी शब्दकोष में समाहित करके सिलेबस में नहीं बाँधा जा सकता। रही धर्म गुरु होने की बात तो ये इश्वर में आश्था की पराकाष्ठा पार कर अलौकिक ज्ञान प्राप्त कर लेने वालों के लिए ही हो सकता है... और जहाँ तक मुझे लगता है... डिग्री इंसान को किताबी ज्ञान तो दे सकती हैं लेकिन आस्था से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है... अगर ऐसा नहीं होता तो कबीर , रहीम और तुलसीदास को किसी विश्वविद्यालय का कुलपति हुए बगैर इतनी गूढ़ रहस्यों का रहस्योद्घाटन करने का हक नहीं मिलना चाहिए था... कबीर के द्वारा जो योग दर्शन व्यक्त किया गया वह आज भी शोध का विषय बना हुआ है.... उन्होंने परब्रह्म को पाने और योग के माध्यम से खुद के नवनिर्माण की जो बात कही , स्वामी रामदेव उसी कड़ी को कुछ अंशों में आगे ले जाते हुए दीखते हैं... लेकिन रामदेव अभी भी योग से स्वस्थ्य को जोड़ने में व्यस्त हैं... योग की पूर्णता तो गीता में ही दीखती है... खैर मैं इन विवादों में नहीं पड़ना चाहता ... मैं तो ये चाहता हूँ की जिन विषयों पर लोगों को ज्ञान न हो उन विषयों पर अनर्गल राय व्यक्त करने से बचना चाहिए...
मीडिया में कार्यरत लोग... एक ओरे तो किसी को इच्छाधारी कहते हैं वहीँ दूसरी तरफ उसको संत भी कहते हैं... मेरे हिसाब से संत वो होता है जिसने साड़ी इच्छाओं का त्याग कर दिया हो.... संत की कहीं भी ऐसी परिभाषा नहीं जो मीडिया वाले बतलाने में जुड़े होते हैं....
खैर मीडिया के लोग चीख चीख कर कहते हैं "ये देखिये... एक संत का असली चेहरा... सेक्स रैकेट चलता हुआ पकड़ा गया ये संत....." न्यूज़ की सुर्खियाँ ये भी हो सकती हैं... "संत के भेष में छुपा एक अपराधी का पर्दाफाश... अरसे से सेक्स रैकेट चलने वाला यह अपराधी पहले भी लोगों को बेवकूफ बना चूका है..." पहले वाक्य में संत दोषी लगता है... लेकिन अगले वाक्य में दोष अपराधी पर है...
आज कल टी.वी.चैनलों पर तमाम नास्तिक लोगों को बुला कर उनका मुठभेड़ तमाम शश्त्रिओन और पंडितों से करवा कर थोथे तर्क वितर्क का कार्यक्रम चलाया जाता है.... जिन लोगों को जिस विषय का ज्ञान ही नहीं उन्हें बहस में बिठाने का क्या मतलब? ऐसा लगता है जैसे मैना , कौवा , तोता, बगुला सभी अपनी अपनी भाषा में बात कर रहे हैं... लेकिन जो ज्ञानी पुरुष वहां बैठा है वो अपनी छीछालेदर करवाने वहां आया है...
अरे भाई....
इस देश की जनता भूखों मरने के कागर पर है... मीडिया अगर चौथा खम्भा है... तो उसको जनता के ऊपर केन्द्रित होकर , सरकार, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका के बीच के सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए न की... लोगों को इस अनुत्तरित बहस में फंसा कर उनका समय और मान दोनों ख़त्म करना चाहिए...
क्रमशः ........

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