शनिवार, 1 अगस्त 2009

आजाद गुलामी : गुलाम भारत


पटना १ अगस्त २००९। आज हम लोग एक बार फ़िर से उस पावन महीने में प्रवेश कर गए जिस महीने में हमारा देश आजाद हो पाया था। मैंने यहाँ "आजाद हो पाया था" लिखा क्योंकि भारत ने आजादी कोशिशों की बदौलत पायी थी। हमारे देश को आजादी खैरात में नही मिली थी भारत के सपूतों के रक्त से सनी आजादी की कीमत आज किसी को समझ नही आती। आज लोग जो आजाद भारत में पैदा हो रहे हैं वो आजाद भारत की महत्ता को क्या समझेंगे जब उन्होंने गुलामी का मतलब ही नही जाना ?
दरअसल अंग्रेजों की गुलामी नें इस हिंदुस्तान में नौकरी को इस कदर थोप दिया की आज भी इंसान नौकर ही पैदा हो रहा है। कोई लाख पढ़ लिख ले उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ नौकरी करना होता है जो नौकरी नही करते उनकी कोई पूछ नही । जो नौकर हैं उनकी हर जगह पूछ है। जो आजाद ख्याल हैं किसी की गुलामी पसंद नही करते वो हो सकता है भारत के स्वाभिमान को एक बार फिर से जिन्दा कर दें लेकिन जो नौकरी पसंद हैं वो तो सिर्फ़ गुलामी जानते हैं और अगर मौका मिले तो बेईमानी भी । कोई कोई नौकर काफ़ी इमानदार भी होते हैं। लेकिन मेरा सन्दर्भ यहाँ यह है की अगर इस मुल्क में आजादी है तो यहाँ नौकरी करने वाले नौकरों की नही बल्कि राष्ट्र हित में कार्य करने वालों की कर्मयोगियों की जरूरत है। लोग पैदा होते हैं , पढ़ाई लिखी करने के बाद "नौकरी" ढूँढने में लग जाते हैं। कोई राष्ट्र हित में अगर सेना में भी भरती हो जाए तो उसकी मानसिकता भी यदि यही होती है की मैं तो सेना में नौकरी रत हूँ, तो इस राष्ट्र की दुर्दशा क्या होगी कोई सोंच भी नही सकता।
आज आए दिन घोटालों और घोटालेबाजों के किस्से और करतूतें सामने आ रही हैं। वजह है नौकर होने की मानसिकता होने का। एक नौकर तो ऐसा होता ही है। कोई इमानदार कोई बेईमान लेकिन अगर जिम्मेदारी हो आजाद भारत को ताकतवर बनाने की तो मुझे लगता है की चोरों के दिल में भी कुछ पल के लिए इस देश के लिए मर मिटने का जज्बा पैदा हो जाएगा शर्मनाक है ये की माता पिता अपने बच्चे के बारे में ये कहते हैं की "मेरा बेटा तो बहुत अच्छी नौकरी में है। भगवन की दया से और अपनी मेहनत से वो आज जिस मुकाम पर है मुझे उस पर गर्व है।" अगर कोई जवान दिल और जवान खून इस मुल्क के लोगों की तकलीफें दूर करने के लिए समाजसेवा में कदम रख ले या राजनीति में आगे बढ़ने की कोशिश करे, इस राष्ट्र की इमानदार सेवा में लगने का संकल्प ले तो समाज और समाज के ठेकेदार उसको निकम्मा और फालतू का दर्जा दे डालते हैं।

राहुल गाँधी ३९ की उमर में इतना परिपक्व मान लिए जाते हैं की वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन एक राजनैतिक कार्यकर्ता जो कहीं से भी उनसे कम नही सिवा एक बात "विरासत" को छोड़ कर , तो वो चाहे ६० का भी क्यों न हो बच्चा मान लिया जाएगा।

जो लोग राजनीती में हैं वो लोग कान के कच्चे होते हैं ऐसा हमने सुना है और देखा भी है। ऐसा राजा किस काम का जो देखने के लिए कान का उपयोग करता हो ? ऐसे राजा तो अपंग हुए तो आँख रहते अंधे हैं । खैर चाहे किसी भी दल या कुनबे की बात करें लोगों में ख़ुद की असुरक्षा का भय कुछ इस कदर समां चुका है की लोग अपनी परछाई से भी डरने लगे हैं। रही राजा और प्रजा होने की बात तो जो लोकतंत्र में राजा मान लिया गया है दरअसल वो प्रजा का सबसे बड़ा नौकर है। लोकतंत्र में तो प्रजा को राजा का दर्जा हासिल है फिर लाल बत्ती मंत्रियों को किस लिए। और उनके मार्ग में आने वाली जनता को धुप में घंटो खड़े करने का क्या मतलब ? वैसे राजनीत में अन्दर जो है वो भी कम नही । अब सुनिए.... किसी दल के युवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की उमर ५० साल के करीब हो , उनको युवाओं से खतरा नही महसूस होगा तो क्या होगा ? किसी दल के छात्र इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष छात्र हो ही नही तो उसको छात्रों से भय महसूस होगा या नही होगा॥? किसी दल के किसान इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी भी तरह किसान हो ही नही तो उसको किसानो से भय महसूस होगा या नही ? किसी दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनैतिक व्यक्ति हो ही नही तो उस व्यक्ति को राजनैतिक कार्यकर्ताओं से खतरा महसूस होगा या नही ? जरूर होगा। क्योंकि, भय की सिर्फ़ एक परिभाषा है। "जो सन्दर्भ आपकी समझ से परे है वह आपमें भय पैदा करने के लिए पर्याप्त है।" मतलब ये की अगर आप युवा नही रहे तो युवा होने की अनुभूति भी आप में नही होगी। मतलब ये की युवा मन आपकी समझ से परे होगा और आप युवाओं को समझ नही पाएंगे और आपको यही बात भय के प्रभाव में डालने के लिए काफ़ी है। छात्र , किसान , और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के मामले के सन्दर्भ भी इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाते हैं। मतलब ये हुआ की बेखौफ भारत के लिए बेखौफ और इमानदार नेताओं की जरूरत है। जिनकी खून में गर्मी भी हो और कार्यकुशलता भी। आँखों में सपने भी हों और पूरा कर के उन सपनो को जीने की ताकत और जिंदगी के साल भी।

आज भारत की आजादी मानाने की कवायदें फिर शुरू हो गयीं। अनगिनत लोग एक बार फिर राष्ट्र भक्ति में डूब जायेंगे। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, दूसरे के घरों में पैदा हुए अच्छे लगते हैं। उनकी माता पर दूसरी माताओं को गर्व होता है.... लेकिन यदि अपने घर में कोई भगत सिंह पैदा हो गया तो वो आँख की किरकिरी और खानदान की मिटटी पलीद करने वाला ही दिखाई देता है... विधवा विवाह दूसरे के बच्चे करते ही सोभते हैं ... अपने लाल के लिए तो अपने पसंद की बहु ही चाहिए होती है... समाज सुधारक, समाजसेवी, और तमाम फालतू की बकवास करने वाले लोग दूसरों की घरों में ही पैदा होते शोभते हैं... अपने यहाँ तो अच्छी नौकरी करने वाला कमाऊ पूत ही अच्छा लगता है... खास तौर से तब जब घर की माली हालत ख़राब हो... और इस देश की ८० प्रतिशत से भी अधिक जनता की माली हालत ख़राब है तो इस देश में नौकर पसंद करने वाले माँ बाप और नौकरी पसंद पूत पैदा नही होगा तो क्या होगा...?
राजनीत में जो लोग हैं ऊपर बैठे हुए उनको राजा कहलाने की आदत हो गई है... क्योंकि उनको "हूजूर" कहलाना अच्छा लगता है... और वो लोगों को "हूजूर" कहकर "हुज़ूर" न होने का भान देकर ख़ुद में महान होने का भ्रम पाल लेते हैं।
राजनैतिक दल आज के समय में नेता नही गुलाम पैदा करते हैं। किसी भी दल में चले जायें वहां पर वही आया होता है जिसमे आम इंसानों को नेतृत्व देने की भावना होती है लेकिन उन्हें जो सबसे पहला पाठ पढाया जाता है वो यह है की "तुम्हे जो कहा जाए सिर्फ़ वो करो । अपनी सोंच समझ और काबिलियत को अपने पास रखो । दल के दरवाजे आने और जाने वालों के लिए सदैव खुले हैं। मैं तुम्हे पदाधिकारी बनाऊंगा तब तुम पदाधिकारी माने जाओगे। मैं तुम्हे मौका दूँगा तब तुम नेता बन पाओगे। यानि की अगर नेता बनाना चाहते हो तो गुलाम बन जाओ। ठीक वैसे ही जैसे चैन से सोना चाहते हो तो जाग जाओ। " यही मानसिकता पीढीदर्पीधि आगे बढती जा रही है। जो ताकतवर है उसकी गुलामी करने में कैसी शर्म ... ? गुलामी करने से गुलामी करवाने का अधिकार भी तो मिल सकता है... ?वाह रे नेता.... कैसी सोंच है तेरी...? आजादी रस्सिओं को काटने से नही बल्कि सोंच से आती है... विचारों से आती है... और मुल्क सोंच से नौकर है , गुलाम है... क्योंकि अधिकांश लोग आज नौकरी नही मिलने से "बेरोजगार" हैं और नौकरी करना ही इनका परम लक्ष्य है... ये स्वरोजगार करके स्वावलंबी नही बनाना चाहते... ख़ुद को नयी नयी दलीलें देकर थोथी तर्क - वितर्क करके पिछडों में शामिल करवा कर उनका हक भी मार लेने से बाज़ नही आ रहे... जिस रास्त्र के लोग पिछडों में शामिल होने के लिए आन्दोलन करते हों क्या वो राष्ट्र वाकई विकास कर रहा है? और ये आन्दोलन वस्तुतः नौकरी पाने और ऐसी ही मामलों में सुविधाएँ पाने के लिए हो तो ? और वो जो आजाद है जैसे की मैं और हो सकता है की आप भी ... मैं अकेला चल पड़ा हूँ भारत को आजाद कराने अपने कुछ मित्रों के साथ। एक दिन हम कामयाब होंगे जब भारत में नौकर नही कर्मयोगी पैदा होंगे। सैनिक पैदा होंगे, नेता पैदा होंगे ... गुलाम नही।

जय हिंद । जय भारत। जय जनते ।

7 टिप्‍पणियां:

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  2. Jugnoo g ,sabse pahle aapko badhayi.Aapne ek achcha sawal uthaya hai."Karmyogi bane Aaj ka Bharat".Srimad Bhagwad mein v Sri Krishan ne KARMYOG ki hi baat ki thi.sahi Netritva hamesha karm ki hi bakalat karta hai.Par Nikmme logon ko hamesha karmyogiyon se bhay lagta aaya hai.wah kyu na daree agar uske samne nichepaydan par khara aadmi jyada kabiliyat rakhta ho aur Jyada karmshil ho .Kisi Party ka Youth National President hi agar 48-50 ka ho to use Yuvao se to aise hi dar lagega kyunki agar wah is umra mein abhi tak sirf Party ka hi Padadhikari ban paya ho aur Janta mein koi khas pahchan v nahi bana paya ho to yeh to uske liye Dub marne ki baat hogi. ... Lakin wah akele nahi dubega wah dubega apne sath-sath achche karyakartaon ke sath.unki Rajnaitik Paripakwataon ko khatam karke unke sath ul julul harkaten karke.Lakin ek kahawat to aap v Jante honge. "ki us chilman ko kaun bujhaye Jisko Roshan Khuda kare". Bharat ki Janta koi bhenr bakri nahi hai ki use Jo chahe -Jaise haank le.Bharat ki Janta ko Jarurat hai ek sahi Netritva ki jo use sahi Dishaon mein le ja sake. Sharir aur Man se asakt log kabhi v sahi Netritva pradan nahi kar sakte hain.Is Desh ko Udhyami aur Urjawan Netritva ki Jarurat hai.Aur Mujhe biswas hai HUMLOG ek din Awasya safal honge.Apne is Mukam pe.

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  3. ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है. मैं इस दुनिया में कोई पुराना नहीं हूँ लेकिन आपकी लेखनी की कद्र करते हुए मुझे ख़ुशी हो रही है. रही बात आपके ब्लॉग की तो इसके रंग के साथ आपकी पोस्ट के अक्षरो के रंग आँखों को चुभ रहे है. इसलिए अक्षरो को कुछ बड़ा और एक ही रंग में रखो तो पढने में अच्छा रहेगा. पुनः बधाई. मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है. www.gooftgu.blogspot.com

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