सोमवार, 3 अगस्त 2009

लाल क्रन्तिकारी या तो पीठ हैं या फ़िर पेट


पटना ४ अगस्त।
मुझे लाल क्रांति से सम्बंधित इन क्रांतिकरिओं और सरकारी , पुलिसिया, और अफसरी तंत्र के बीच एक सम्बन्ध नजर आने लगा है खास तौर से १९९१ के चरण और २००८ के आर्थिक मंदी के मामले में इन लाल क्रांतिकरिओं के व्यवहार और कार्यकलापों को देखते हुए....
खैर अब एक उदहारण लीजिये। एक बार एक आदमी किसी अमीर आदमी के घर गया। वहां उसने अपनी आंखों से बहुत कीमती कीमती वस्तुएं देखि। जो उसने पहले कभी नही देखी थी। उस आदमी के मन-मस्तिष्क में एक लालच और चोरी करने का विचार जागा। वह दबे हुए कदमों से आहिस्ता आहिस्ता चलता हुआ उस सामान तक सावधानी से पहुँचा। उस आदमी नें अपनी गर्दन इधर उधर घुमा कर अपनी नजरें दौराईं और उसने धीमे से उस कीमती वस्तु को अपनी हाथों में लेकर अपने झोले में रख लिया। अब चोरी हो चुकी थी लिहाज़ा तेज कदमों से चलता हुआ वो आदमी घर से बाहर जाने को हुआ। किसी नें उसे संदिग्धावस्था में देख लिया। वह भागने को दौडा और कुछ दूर भागने के बाद पकड़ा गया। उसकी हालत ये साफ़ बयां कर रही थी की उसने चोरी की है। लिहाज़ा लत्तम जुत्तम शुरू हो गया। झापड़, तमाचा, घूंसे और केहुनी की घमाघम शुरू हो गई। जाहिर है इन घमाघम प्रोग्राम के लिए पीठ सबसे उपयुक्त होता है और हुआ भी। और घूंसों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान पेट होता है सो हुआ भी। झापड़ और तमाचा तो गाल पर ही लगता है। मार कितनी भी भयावह लगे झापड़ और तमाचे की संख्या निम्नतम होती है। यानी कुल मिला के ये मतलब निकला की मूल मार घूंसों और घमाघम केहुनी की हुई। मतलब ये हुआ की पेट और पीठ बुरी तरह पिटे।

अब सोंचिये....

चोरी जैसे जघन्य अपराध करने में शामिल दोषिओं के नाम .... आँखें, मन-मस्तिष्क , कदम या टांगें, गर्दन, हाथ आदि,

जिसे सजा मिली वो था पेट और पीठ

इस पूरे प्रकरण में बेचारे पेट और पीठ का क्या दोष था जो वो पिट गए वो भी इस कदर ? जो बेचारे असहाए हैं जिधर टांगें भागेंगी उधर जाना उनकी मजबूरी है। ऐसे स्थिति में मैं अगर देखूं तो मुझे पेट और पीठ के साथ अन्याय होता दीखता है... और सही मामले में दोषिओं को सजा मिली ही नही।

जहाँ विकास नही पहुँच पा रहा वहां पहले से ही लाल क्रन्तिकारी यानि कामरेड पहुँच जा रहे हैं। जंगल और जमीन के मामले में बस येही समझ लीजिये की वो वही कीमती सामान है जिसे पहले किसी नें देखा नही था। जो आँखें देख रही हैं वो व्यापारिओं की आँखें हैं। जो मन-मस्तिष्क लालच से भरा पड़ा है वो सरकारी (राजनैतिक) मन है। जो कदम वहां तक जा रही हैं वो पुलिसिया कदम है, विदेशिओं के कदम हैं जिनकी आँखें तिरछी होती हैं... या तिरछी आंखें पाये जाती हैं... जो गर्दन इधर उधर घूम कर नजरें दौरा रही हैं वो दलालों की भूमिका में हैं तो जो हाथ उस सामान को छू रहे हैं वह हाथ गद्दारों के हैं, चोरों के हैं, यानि अफसरी हाथ हैं, जो असली मालिकों के वस्तुओं को चुरा लेना चाहते हैं। उन्हें उस पूँजी से बेदखल कर देना चाहते हैंकभी उन्हें विकास के नाम पर कभी वन संरक्षण के नाम पर, कभी बाघों के संरक्षण के नाम पर आदि आदि और जब सब कुछ जनता जनार्दन की नजर में बे परदा होने को हो तो .... पीठ और पेट यानि आदिवासिओं और कमजोर तबके के लोगों पर घमाघम प्रोग्राम , घूंसे और लत्तम जुत्तम मजे की बात तो ये की इस कार्यक्रम के एवज में भी कमाई यानि की चोर पकड़ने का इनाममतलब ये हुआ की नाक्सालिओं के नाम पर उनसे पंगे लेने के लिए जो अरबों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं .... मेरा तात्पर्य इस तथ्य से है... उस धन का उपभोग तो कोई सामजिक जीव मात्र ही करते हैं.... वैसे भी धन की तीन गति है.... भोग... दान ... अथवा नाश... भोग ही अछा है... दान करने से .... तो सारा धन भोग में गया....
ऐसे ही कन्डीशन में पेट और पीठ कवच धारण करने लगा है... कछुओं की तरह। जाहिर है इनकी चाल तो धीमी होगी लेकिन ये चलेंगे अनवरत कुछ लोग कवच खरीद कर भी पहन लेते हैं ... कर्ण बनने के लिए लेकिन वो कर्ण नही हो सकते क्योंकि वो दानी नही हड़पने वाले धूर्त और अव्वल दर्जे के मक्कार होते हैं जो अमूमन मस्तिष्क के द्वारा संचालित और अन्य दोषिओं के द्वारा समर्थित और कभी कभी आंखों के द्वारा संपोषित भी होते हैं।

ये कवच धारण करने का सिलसिला बंद हो और वो भी सामान्य पेट और पीठ की भांति रहे... तो कहाँ कहाँ सुधार करना होगा मेरे ख्याल से जब इतना पढिये लिए तो ऊ तो समझिये गए होंगे...

आजाद भारत में ई सब नौटंकी होगा तब कैसे विकास होगा। आजादी का परचम लहराने के लिए गुलामी करवाने की प्रथा समाप्त करनी होगी। बराबर का हक देना होगा और सम्मान भी। प्रकृति के संरक्षण का मतलब ये नही की जानवरों की जान की कीमत इंसानों के जान से अधिक हो जाए।
ऐसा हो सकता है की ये लेख किन्ही इमानदार और समर्पित भाइयों को आहात करे । मैं उनसे तत्काल क्षमा चाहता हूँ। लेकिन अगर अंतरात्मा की आवाज सुनी जाए तो सारे शिकवे स्वतः नष्ट हो जायेंगे। उपरोक्त पुष्टिकरण उस हर कार्मिक परिप्रेक्ष्य में लागू हैं जहाँ अपने फर्ज और मिटटी से गद्दारी करने की कवायदें मन-मस्तिष्क में उपजती हैं और हमारा अंग अंग उनका साथ देता है.... पेट और पीठ तो असहाय हैं । पेट को पापी पेट की पहचान मिली और पीठ की तो पहचान भी नही मिली कभी...

जय हिंद जय भारत जय जनते ।

शनिवार, 1 अगस्त 2009

आजाद गुलामी : गुलाम भारत


पटना १ अगस्त २००९। आज हम लोग एक बार फ़िर से उस पावन महीने में प्रवेश कर गए जिस महीने में हमारा देश आजाद हो पाया था। मैंने यहाँ "आजाद हो पाया था" लिखा क्योंकि भारत ने आजादी कोशिशों की बदौलत पायी थी। हमारे देश को आजादी खैरात में नही मिली थी भारत के सपूतों के रक्त से सनी आजादी की कीमत आज किसी को समझ नही आती। आज लोग जो आजाद भारत में पैदा हो रहे हैं वो आजाद भारत की महत्ता को क्या समझेंगे जब उन्होंने गुलामी का मतलब ही नही जाना ?
दरअसल अंग्रेजों की गुलामी नें इस हिंदुस्तान में नौकरी को इस कदर थोप दिया की आज भी इंसान नौकर ही पैदा हो रहा है। कोई लाख पढ़ लिख ले उद्देश्य सिर्फ़ और सिर्फ़ नौकरी करना होता है जो नौकरी नही करते उनकी कोई पूछ नही । जो नौकर हैं उनकी हर जगह पूछ है। जो आजाद ख्याल हैं किसी की गुलामी पसंद नही करते वो हो सकता है भारत के स्वाभिमान को एक बार फिर से जिन्दा कर दें लेकिन जो नौकरी पसंद हैं वो तो सिर्फ़ गुलामी जानते हैं और अगर मौका मिले तो बेईमानी भी । कोई कोई नौकर काफ़ी इमानदार भी होते हैं। लेकिन मेरा सन्दर्भ यहाँ यह है की अगर इस मुल्क में आजादी है तो यहाँ नौकरी करने वाले नौकरों की नही बल्कि राष्ट्र हित में कार्य करने वालों की कर्मयोगियों की जरूरत है। लोग पैदा होते हैं , पढ़ाई लिखी करने के बाद "नौकरी" ढूँढने में लग जाते हैं। कोई राष्ट्र हित में अगर सेना में भी भरती हो जाए तो उसकी मानसिकता भी यदि यही होती है की मैं तो सेना में नौकरी रत हूँ, तो इस राष्ट्र की दुर्दशा क्या होगी कोई सोंच भी नही सकता।
आज आए दिन घोटालों और घोटालेबाजों के किस्से और करतूतें सामने आ रही हैं। वजह है नौकर होने की मानसिकता होने का। एक नौकर तो ऐसा होता ही है। कोई इमानदार कोई बेईमान लेकिन अगर जिम्मेदारी हो आजाद भारत को ताकतवर बनाने की तो मुझे लगता है की चोरों के दिल में भी कुछ पल के लिए इस देश के लिए मर मिटने का जज्बा पैदा हो जाएगा शर्मनाक है ये की माता पिता अपने बच्चे के बारे में ये कहते हैं की "मेरा बेटा तो बहुत अच्छी नौकरी में है। भगवन की दया से और अपनी मेहनत से वो आज जिस मुकाम पर है मुझे उस पर गर्व है।" अगर कोई जवान दिल और जवान खून इस मुल्क के लोगों की तकलीफें दूर करने के लिए समाजसेवा में कदम रख ले या राजनीति में आगे बढ़ने की कोशिश करे, इस राष्ट्र की इमानदार सेवा में लगने का संकल्प ले तो समाज और समाज के ठेकेदार उसको निकम्मा और फालतू का दर्जा दे डालते हैं।

राहुल गाँधी ३९ की उमर में इतना परिपक्व मान लिए जाते हैं की वो प्रधानमंत्री बन सकते हैं। लेकिन एक राजनैतिक कार्यकर्ता जो कहीं से भी उनसे कम नही सिवा एक बात "विरासत" को छोड़ कर , तो वो चाहे ६० का भी क्यों न हो बच्चा मान लिया जाएगा।

जो लोग राजनीती में हैं वो लोग कान के कच्चे होते हैं ऐसा हमने सुना है और देखा भी है। ऐसा राजा किस काम का जो देखने के लिए कान का उपयोग करता हो ? ऐसे राजा तो अपंग हुए तो आँख रहते अंधे हैं । खैर चाहे किसी भी दल या कुनबे की बात करें लोगों में ख़ुद की असुरक्षा का भय कुछ इस कदर समां चुका है की लोग अपनी परछाई से भी डरने लगे हैं। रही राजा और प्रजा होने की बात तो जो लोकतंत्र में राजा मान लिया गया है दरअसल वो प्रजा का सबसे बड़ा नौकर है। लोकतंत्र में तो प्रजा को राजा का दर्जा हासिल है फिर लाल बत्ती मंत्रियों को किस लिए। और उनके मार्ग में आने वाली जनता को धुप में घंटो खड़े करने का क्या मतलब ? वैसे राजनीत में अन्दर जो है वो भी कम नही । अब सुनिए.... किसी दल के युवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की उमर ५० साल के करीब हो , उनको युवाओं से खतरा नही महसूस होगा तो क्या होगा ? किसी दल के छात्र इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष छात्र हो ही नही तो उसको छात्रों से भय महसूस होगा या नही होगा॥? किसी दल के किसान इकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी भी तरह किसान हो ही नही तो उसको किसानो से भय महसूस होगा या नही ? किसी दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनैतिक व्यक्ति हो ही नही तो उस व्यक्ति को राजनैतिक कार्यकर्ताओं से खतरा महसूस होगा या नही ? जरूर होगा। क्योंकि, भय की सिर्फ़ एक परिभाषा है। "जो सन्दर्भ आपकी समझ से परे है वह आपमें भय पैदा करने के लिए पर्याप्त है।" मतलब ये की अगर आप युवा नही रहे तो युवा होने की अनुभूति भी आप में नही होगी। मतलब ये की युवा मन आपकी समझ से परे होगा और आप युवाओं को समझ नही पाएंगे और आपको यही बात भय के प्रभाव में डालने के लिए काफ़ी है। छात्र , किसान , और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के मामले के सन्दर्भ भी इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाते हैं। मतलब ये हुआ की बेखौफ भारत के लिए बेखौफ और इमानदार नेताओं की जरूरत है। जिनकी खून में गर्मी भी हो और कार्यकुशलता भी। आँखों में सपने भी हों और पूरा कर के उन सपनो को जीने की ताकत और जिंदगी के साल भी।

आज भारत की आजादी मानाने की कवायदें फिर शुरू हो गयीं। अनगिनत लोग एक बार फिर राष्ट्र भक्ति में डूब जायेंगे। लेकिन भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद, दूसरे के घरों में पैदा हुए अच्छे लगते हैं। उनकी माता पर दूसरी माताओं को गर्व होता है.... लेकिन यदि अपने घर में कोई भगत सिंह पैदा हो गया तो वो आँख की किरकिरी और खानदान की मिटटी पलीद करने वाला ही दिखाई देता है... विधवा विवाह दूसरे के बच्चे करते ही सोभते हैं ... अपने लाल के लिए तो अपने पसंद की बहु ही चाहिए होती है... समाज सुधारक, समाजसेवी, और तमाम फालतू की बकवास करने वाले लोग दूसरों की घरों में ही पैदा होते शोभते हैं... अपने यहाँ तो अच्छी नौकरी करने वाला कमाऊ पूत ही अच्छा लगता है... खास तौर से तब जब घर की माली हालत ख़राब हो... और इस देश की ८० प्रतिशत से भी अधिक जनता की माली हालत ख़राब है तो इस देश में नौकर पसंद करने वाले माँ बाप और नौकरी पसंद पूत पैदा नही होगा तो क्या होगा...?
राजनीत में जो लोग हैं ऊपर बैठे हुए उनको राजा कहलाने की आदत हो गई है... क्योंकि उनको "हूजूर" कहलाना अच्छा लगता है... और वो लोगों को "हूजूर" कहकर "हुज़ूर" न होने का भान देकर ख़ुद में महान होने का भ्रम पाल लेते हैं।
राजनैतिक दल आज के समय में नेता नही गुलाम पैदा करते हैं। किसी भी दल में चले जायें वहां पर वही आया होता है जिसमे आम इंसानों को नेतृत्व देने की भावना होती है लेकिन उन्हें जो सबसे पहला पाठ पढाया जाता है वो यह है की "तुम्हे जो कहा जाए सिर्फ़ वो करो । अपनी सोंच समझ और काबिलियत को अपने पास रखो । दल के दरवाजे आने और जाने वालों के लिए सदैव खुले हैं। मैं तुम्हे पदाधिकारी बनाऊंगा तब तुम पदाधिकारी माने जाओगे। मैं तुम्हे मौका दूँगा तब तुम नेता बन पाओगे। यानि की अगर नेता बनाना चाहते हो तो गुलाम बन जाओ। ठीक वैसे ही जैसे चैन से सोना चाहते हो तो जाग जाओ। " यही मानसिकता पीढीदर्पीधि आगे बढती जा रही है। जो ताकतवर है उसकी गुलामी करने में कैसी शर्म ... ? गुलामी करने से गुलामी करवाने का अधिकार भी तो मिल सकता है... ?वाह रे नेता.... कैसी सोंच है तेरी...? आजादी रस्सिओं को काटने से नही बल्कि सोंच से आती है... विचारों से आती है... और मुल्क सोंच से नौकर है , गुलाम है... क्योंकि अधिकांश लोग आज नौकरी नही मिलने से "बेरोजगार" हैं और नौकरी करना ही इनका परम लक्ष्य है... ये स्वरोजगार करके स्वावलंबी नही बनाना चाहते... ख़ुद को नयी नयी दलीलें देकर थोथी तर्क - वितर्क करके पिछडों में शामिल करवा कर उनका हक भी मार लेने से बाज़ नही आ रहे... जिस रास्त्र के लोग पिछडों में शामिल होने के लिए आन्दोलन करते हों क्या वो राष्ट्र वाकई विकास कर रहा है? और ये आन्दोलन वस्तुतः नौकरी पाने और ऐसी ही मामलों में सुविधाएँ पाने के लिए हो तो ? और वो जो आजाद है जैसे की मैं और हो सकता है की आप भी ... मैं अकेला चल पड़ा हूँ भारत को आजाद कराने अपने कुछ मित्रों के साथ। एक दिन हम कामयाब होंगे जब भारत में नौकर नही कर्मयोगी पैदा होंगे। सैनिक पैदा होंगे, नेता पैदा होंगे ... गुलाम नही।

जय हिंद । जय भारत। जय जनते ।